प्रिय दर्शकों/पाठकों, आधुनिक भागदौड के इस जीवन में कभी न कभी हर व्यक्ति डिप्रेशन अर्थात अवसाद का शिकार हो ही जाता है। डिप्रेशन आज इतना आम हो चुका है कि लोग इसे बीमारी के तौर पर नहीं लेते और नजरअंदाज कर देते हैं। किन्तु ऎसा करने का परिणाम कभी कभी बहुत ही बुरा हो सकता है।काम की भागदौड़ में कई बार इंसान डिप्रेशन का शिकार हो जाता है यानी वह मानसिक अवसाद में आ जाता है। ऐसा होना आम बात है लेकिन कई बार डिप्रेशन इतना अधिक बड़ जाता है कि वह कुछ समय के लिए अपनी सुध-बुध खो बैठता है। कुछ लोग डिप्रेशन के कारण पागलपन का शिकार भी हो जाते हैं।
आज अवसाद (डिप्रेशन) शब्द से लगभग सभी लोग परिचित हैं, और साथ ही एक बड़ी संख्या में लोग इसका शिकार भी हैं। अवसाद, हताशा, उदासी गहरी निराशा और इनसे सम्बंधित रोग चिकित्सीय जगत में मेजर डिप्रेशन (Major depression), डिस्थाइमिया (Dysthymia), बायपोलर डिसऑर्डर या मेनिक डिप्रेशन (Bipolar disorder or manic depression), पोस्टपार्टम डिप्रेशन (Postpartum depression), सीज़नल अफेक्टिव डिसऑर्डर (Seasonal affective disorder), आदि नामों से जाने जाते हैं। वैसे हर किसी के जीवन में ऐसे पल आते हैं, जब उसका मन बहुत उदास होता है। इसलिए शायद हर एक को लगता है कि हम गहरी निराशा के विषय में सब कुछ जानते हैं। परन्तु ऐसा नहीं है। कुछ के लिए तो यह निराशावादी स्थिति एक लंबे समय के लिए बनी रहती है; जिंदगी में अचानक, बिना किसी विशेष कारण के निराशा के काले बादल छा जाते हैं और लाख प्रयासों के बाद भी वे बादल छंटने का नाम नहीं लेते। अंततः हिम्मत जवाब दे जाती है और बिलकुल समझ में नहीं आता कि ऐसा क्यों हो रहा है। इन परिस्थितियों में जीवन बोझ समान लगने लगता है और निराशा की भावना से पूरा शरीर दर्द से कराह उठता है। कुछ का तो बाद में बिस्तर से उठ पाना भी लगभग असंभव सा हो जाता है। इसलिए प्रारंभिक अवस्था में ही इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि वह व्यक्ति हद से ज्यादा उदासी में न डूब जाये। समय रहते लक्षणों को पहचान कर किसी विशेषज्ञ डॉक्टर से तुरंत परामर्श लेना चाहिए व तदनुसार इलाज करवाना चाहिए।
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार डिप्रेशन एक मानसिक स्थिति है जो कि अलग-अलग लोगों में अलग-अलग कारणों से होता है जिसकी वजह से इसके लक्षण, इलाज और प्रभाव भी भिन्न होते हैं। डिप्रेशन को उसकी विशेषताओं के आधार पर कुछ प्रकारों में बांटा गया है।ऐसी अवस्था जिसमें व्यक्ति के दिमाग में नकारात्म विचारों की अधिकता हो जाती है डिप्रेशन कहलाता है। डिप्रेशन कई प्रकार के होते हैं। कुछ के लक्षण साधारण होते हैं तो कुछ डिप्रेशन में लक्षण गंभीर हो सकते हैं। अगर डिप्रेशन की अवस्था लंबे समय तक रहे तो यह गंभीर रूप ले सकती है। अगर यह लगातार बढ़ता रहा तो पीड़ित व्यक्ति की मौत की भी संभावना रहती है।
डिप्रेशन के प्रकारानुसार एलोपैथी चिकित्सा प्रणाली में अवसादरोधी दवाओं (Antidepressant medications), साइकोथेरेपी (Psychotherapies), विद्युत-आक्षेपी थेरेपी (Electroconvulsive therapy) आदि माध्यमों से चिकित्सा की जाती है। डॉक्टर के परामर्श के अनुसार दवा लेने, दिनचर्या में बदलाव लाने, खानपान में फेरबदल करने तथा व्यायाम आदि से अच्छे परिणाम मिलते हैं। ध्यान रहे, डॉक्टर से पीना पूछे दवाइयाँ बंद करने के बुरे परिणाम हो सकते हैं तथा व्यक्ति की बीमारी और अधिक गंभीर हो सकती है।
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार डिप्रेशन मानसिक लक्षणों के अतिरिक्त शारीरिक लक्षण भी प्रकट करता है,जिनमे दिल की धडकन में तेजी, कमजोरी, आलस और शिरोव्यथा (सिर दर्द) सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त इस रोग से ग्रसित व्यक्ति का मन किसी काम में नहीं लगता,स्वभाव में चिडचिडापन आने लगता है,उदासी रहने लगती है और वह शारीरिक स्तर पर भी थका-थका सा अनुभव करता है। वैसे तो यह बीमारी किसी भी आयु वर्ग के व्यक्ति को कभी भी हो सकती है,किन्तु अनुभव सिद्ध है कि बहुधा इस रोग से पीडित किशोरावस्था के जातक तथा स्त्रियां अधिक होती हैं…….कारण,कि इस रोग का केद्रबिन्दु मन हैं ओर मन भावुक व्यक्ति को अपनी चपेट में जल्दी लेता है। जैसा कि आप सब लोग जानते ही हैं कि स्त्रियों को सृ्ष्टि नें पुरूषों की तुलना में अधिक भावनात्मक बनाया है(परन्तु आधुनिक परिवेश में देखा जाए तो इसका भी अपवाद है,इसी समाज में आपको ऎसी भी स्त्रियां देखने को मिल जाएंगी जो कि निर्दयता में हिंसक जीवों को भी पीछे छोड दें) दूसरा,किशोरावस्था के जातक इस रोग की चपेट में अधिक आते हैं, क्यों कि उनका मन अपने आगामी भविष्य के अकल्पनीय स्वपन संजोने लगता है। स्वपनों की असीमित उडान के पश्चात जब यथार्थ के ठोस धरातल से उनका सामना होता है तो मन अवसादग्रस्त होने लगता है।
यह तो थी चर्चा निराशा, अवसाद, डिप्रेशन आदि के लक्षणों एवं उनके चिकित्सीय निदान की। यद्यपि अध्यात्मशास्त्र शारीरिक चिकित्सा का शास्त्र नहीं है, तदपि देखा गया है कि अध्यात्मशास्त्रज्ञों एवं साधक वर्ग में मनोदैहिक (Psychosomatic) और मानसिक (Psychic) रोगों की मात्रा लगभग नगण्य होती है। अधिकांश मनोदैहिक एवं मानसिक रोग मन से सम्बंधित विकारों तथा कुछ अन्य आध्यात्मिक कारणों से होते हैं; गंभीर मानसिक रोग तो बहुधा आध्यात्मिक कारणों से ही होते हैं। परन्तु उचित साधना से उपजी संतुलित मनःस्थिति एवं आध्यात्मिक बलिष्ठता के कारण साधक वर्ग इन सब से बचा रहता है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार साधक वर्ग से तात्पर्य यहाँ ऐसे वर्ग से है जो वेदान्त व भगवत्गीता आदि में उल्लेखित तथा स्वामी विवेकानंद, श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार और पं. श्रीराम शर्मा आचार्य सरीखे वर्तमानकाल के विद्वानों द्वारा बताई गयी आत्मा, परमात्मा, कर्म, कर्मफल, पुनर्जन्म, संचित, प्रारब्ध, मोक्ष जैसे शब्दों की व्याख्या पर पूर्ण विश्वास करता है एवं पूर्ण आस्था के साथ जीवन के प्रत्येक प्रसंग को इन सिद्धांतों के साथ जोड़कर देखता व करता है।
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार पुरूषों की तुलना में महिलाएं डिप्रेशन से अधिक प्रभावित होती हैं। कुछ शोधकर्ता ऐसा मानते हैं कि डिप्रेशन से वो महिलाएं प्रभावित होती हैं जिनका कोई इतिहास होता है जैसे कि वो पहले कभी सेक्सुअली एब्यूज़ हुई हों या फिर उन्हें किसी प्रकार की इकानामिक परेशानी हुई हो।कई दूसरी बीमारियों की तरह डिप्रेशन भी एक अनुवांशिक बीमारी है। डिप्रेशन की एवरेज एज .. वर्ष से उपर होती हैं। कुछ फिज़ीशियन ऐसा मानते हैं कि ड्रिप्रेशन दिमाग में मौजूद कैंमिकल्स में हुई गड़बड़ी से होता है इसलिए वो एण्टी डिप्रेसेंट दवाएं देते हैं … लेकिन अभी तक ऐसा कोई टेस्ट सामने नहीं आया है, जिसकी मदद से इन कैमिकल्स का लेवल पता किया जा सके। इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं मिला है कि मूड बदलने से जीवन के अनुभव बदलते हैं या इन अनुभवों से मूड बदलता है।डिप्रेशन शारीरिक परेशानियों से भी जुड़ा होता है जैसे फिज़िकल ट्रामा या हार्मोन में होने वाला बदलाव। डिप्रेशन के मरीज़ को अपना शारीरिक टेस्ट भी करा लेना चाहिए। यद्यपि अध्यात्म व इसके सिद्धांतों को तर्क से सिद्ध करने का प्रयास एक निम्न श्रेणी की धृष्टता ही है, फिर भी कहूँगा कि सच्चे आध्यात्मिक सिद्धांतों में कुछ भी ऐसा दुविधापूर्ण नहीं जो वर्तमान विज्ञान की कसौटी पर खरा न उतरता हो, सब कुछ स्पष्ट एवं तर्कपूर्ण है। जैसे ऊर्जा की अक्षुण्णता का सिद्धांत और किसी क्रिया के फलस्वरूप तदनुसार प्रतिक्रिया का सिद्धांत, ये दो वैज्ञानिक सिद्धांत ही आत्मा के अमरत्व सम्बन्धी तथा कर्मफल एवं प्रारब्ध के निर्माण सम्बन्धी आध्यात्मिक सिद्धांतों की पुष्टि हेतु पर्याप्त हैं। इन्हीं दो सिद्धांतों को भली-भांति आत्मसात् कर साधक वर्ग शुद्ध मानसिकता व कर्मों के प्रति सदैव एवं स्वतः सचेत रहता है, यथार्थ में रहता है। उसे यह अच्छी तरह से ज्ञात होता है कि प्रारब्ध कोई शून्य से टपकी वस्तु नहीं, अपितु उसी के द्वारा किये गए कर्मों (क्रिया) के फलस्वरूप उपजा प्रतिक्रियात्मक कोष है, अतः उसका रुझान अनवरत योग्य कर्म के प्रति ही रहता है।
कर्म करते हुए शारीरिक रूप से थक जाने पर या असफलता के क्षणों में भी निराशा उस पर हावी नहीं होती। उसे आत्मा रूपी अक्षुण्ण ऊर्जा का भी ठीक से ज्ञान होता है और इससे सम्बंधित भौतिक तत्वों का भी। इस ब्लॉग के अन्य लेखों में इस सम्बन्ध में विस्तार से खोजा जा सकता है। उपरोक्त सभी कारणों से साधक वर्ग प्रत्येक स्थिति में शांत, आनंदित एवं संतोषी रहता है और अवसाद या डिप्रेशन जैसी मानसिक व्याधि का शिकार नहीं बनता।
अवसाद का मतलब होता है कुण्ठा, तनाव, आत्महत्या की इच्छा होना। अवसाद यानी डिप्रेशन मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य के लिए हानिकारक है, इसका असर स्‍वास्‍थ्‍य पर भी पड़ता है और व्यक्ति के मन में अजीब-अजीब से ख्या‍ल घर करने लगते हैं। वह चीजों से डरने और घबराने लगता है। आइए जानें कैसे खतरनाक है अवसाद..कई बार मन अवसाद ग्रस्त होता है और अपने आप ठीक हो जाता है |लेकिन कई बार अवसाद मन में कहीं गहरे तक बैठ जाता है |
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार विश्व मे जनसंख्या तेज़ि से बढ़ रही है ,टेलीफोन,इंटरनेट ,और बिजली उपकरणों की बदौलत मनुष्य के अंदर इतना अधिक अन्तर व्यवहार हो रहा है जो पहले कभी नहि था | आजकल का पढ़ा लिखा या जरूरतमंद आदमी  टेलीविज़न और इंटरनेट मे खोया हुआ है | हम देखते हैं की यूथ के कानो  मे सेल फ़ोन चिपका हुआ है | हाथ कम्प्यूटर पर थिरक रहे है ,लेकिन इन सब सुख सुविधावो के बावजूद भी मनुष्य अकेला महसूस कर रहा है| थोड़ी मात्रा में तनाव जीवन के लिए अच्छा है क्योंकि यह व्यक्ति की परिस्थितियों से जूझने की क्षमता बढ़ाता है। समस्या तब आती है जब यही तनाव व्यक्ति के सिर चढ़ जाता है और डिप्रेशन का रूप ले लेता है। डिप्रेशन से घिरा व्यक्ति सामान्य काम काज ढंग से नहीं कर पाता और नकारात्मक विचारों से घिर जाता है। कई बार डिप्रेशन इस हद तक बढ़ जाता है कि व्यक्ति को काउंसलर की मदद लेना पड़ती है अन्यथा वो आत्महत्या जैसा कदम तक उठा लेता है। आए दिन अखबार में इस तरह की खबरें पढ़ने को मिल जाती हैं कि फलां व्यक्ति ने रिजल्ट बिगड़ने, नौकरी ना लगने, बीमारी आदि किसी भी कारण से फांसी लगा ली। यह हायपर डिप्रेशन के कारण ही होता है। डिप्रेशन में डूबा व्यक्ति दुनिया से भागने के चक्कर में नशे की लत भी लगा बैठता है, जिससे समस्या और अधिक बढ़ती जाती है।
आजकल कि भागदौड़ मे मनुष्य भीत अधिक व्यावसायिक ही गया है ,उसके पास पत्नि बच्चे परिवार के लिये समय नहि है ,आज मनुष्य अकेले रहना चाहता है ,और अधिकतर समय तनाव  मे रहता है , जिसके परिणाम स्वरूप डिप्रेशन मे आ जाता है |अधिकतर बुद्धिमान और पढ़े लिखे लोग हि इसका शिकार हो रहे है ,कभी कभी तनाव और अवसाद इतना बढ़ जाता है कि मनुष्य भय तनाव दुख़ रक्तचाप ,हृदय रोग ,स्नायु कमजोरी ,ब्रेन ट्यूमर,शुगर इत्यादि अनगिनत रोगो मे फँस जाता है ,और कभी कभी ये रोग इतना बड़ जाता है कि  इंसान पागल तक हो जाता है,ज्योतिष अनुसार तनाव और अवसाद य मानशिक परेशानी के लिये कौन से ग्रह है किनका संबन्ध मानसिक परेशानी से है।
सन्दर्भ : आखिर क्यों होते हैं सेलिब्रिटी अवसाद/डिप्रेशन के शिकार
कल .1 MAY 2018 महाराष्ट्र पुलिस में एडीजी रैंक के पूर्व एटीएस प्रमुख हिमांशु राय ने डिप्रेशन में  खुदकुशी कर ली है। उनकी पहचान बेहद सख्त अफसर की थी। 55 साल के रॉय लंबे वक्त से ब्लड कैंसर से पीड़ित थे। शुक्रवार सुबह उन्होंने अपनी ही सर्विस रिवॉल्वर से खुद को गोली मार ली। उन्होंने आतंकी गतिविधियों से जुड़े मामलों के साथ आईपीएल फिक्सिंग और सट्टेबाजी, जेडे मर्डर, दाऊद की संपत्ति को जब्त करने से जुड़े केस की जांच की थी। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, एटीएस से ट्रांसफर होने के बाद हिमांशु रॉय ने कोई नई नियुक्ति नहीं ली थी। उन्हें कैंसर था और वो स्टेरॉइड्स पर जिंदा थे। उनकी बीमारी फैलती ही जा रही थी, जिसकी वजह से वो पूरी तरह डिप्रेशन में चले गए थे और काफी परेशान रहने लगे थे। काफी इलाज के बाद भी उनके सेहत में कोई सुधार नहीं आ रहा था।  – फिलहाल उनकी महाराष्ट्र पुलिस में एडीजी रैंक की पोस्ट थी।
इसके अलावा उनके अलावा फिल्म ‘दंगल’ में जबरदस्‍त किरदार निभाने वाली एक्‍ट्रेस जायरा वसीम ने पिछले कुछ सालों से अपने डिप्रेशन से जूझने की बात का खुलासा किया है। जायरा ने अपना बयान जारी करते हुए लिखा है, ‘आखिरकार मैं यह जगजाहिर कर रही हूं कि मैं लंबे समय से ‘डिप्रेशन और एनजाइटी’ का शिकार हूं।’ जायरा ने लिखा है कि वह 4 साल से इसका शिकार हैं और इसके चलते उन्‍हें कई बार अस्‍पताल में भर्ती होना पड़ा है डिप्रेशन के चलते हर दिन एक-दो नहीं बल्कि 5 गोलियां खा रही हैं। आमिर खान के साथ फिल्‍म ‘दंगल’ में छोटी गीता फोगाट का किरदार निभाने के बाद जायरा, आमिर के ही साथ फिल्‍म ‘सीक्रेट सुपरस्‍टार’ में भी नजर आ चुकी हैं।  इसके पूर्व में भी हम लोग डिप्रेशन जे जुडी खबरे पढ़ चुके जिसमे अनेक नामी -गिरामी लोग आत्महत्या तक कर चके हैं |
अवसाद के आंकड़ों पर एक नजर
भारत में डिप्रेशन के हालात काफी चिंताजनक है और देश का हर 20वां व्यक्ति डिप्रेशन का शिकार है। बच्चों में हालात और भी खराब है जहां हर देश का हर चौथा बच्चा उदास या निराश है। तो आखिर क्यों डिप्रेशन हमें घेरता जा रहा है, क्या कारण है कि डिप्रेशन के मामले दिनों दिन बढ़ते जा रहे हैं और इस डिप्रेशन से कैसे निपटा जाएं। 2015 में पूरी दुनिया में डिप्रेशन के शिकार करीब 8 लाख लोगों ने अपने जीवन का अंत कर लिया था।  भारत की बात करें तो यहां 5.6 करोड़ और दुनियाभर में .2 करोड़ लोगों को डिप्रेशन का शिकार है। 2015 में पूरी दुनिया में डिप्रेशन के शिकार करीब 8 लाख लोगों ने अपने जीवन का अंत कर लिया था।
ऐसा नहीं है कि केवल बड़े ही डिप्रेशन का शिकार बन रहे है इसमें 13-15 साल के हर चौथे बच्चे को डिप्रेशन होता है। देश के 25 फीसदी बच्चे निराश या उदास हैं। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक 7 फीसदी किशोर झिड़की का शिकार होते है और यह बच्चे परिवार, दोस्तों, शिक्षकों की बातों से आहत होते है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक डिप्रेशन के चलते 11 फीसदी बच्चे ध्यान केंद्रित नही कर पातें, 10 फीसदी किशोरों का कोई करीबी दोस्त ना होने, 8 फीसदी किशोर चिंता की वजह से बेचैन रहने और 8 फीसदी किशोर अकेलापन महसूस करते हैं।
डिप्रेशन के लक्षण को आसानी से समझा जा सकता है जैसे ठीक से नींद नहीं आना, कम भूख लगना, आत्मविश्वास की कमी होना, हमेशा थकान महसूस होना, एकाग्रता में कमी महसूस करना, मादक पदार्थों का सेवन औऱ आत्महत्या के खयाल आना यह सभी इसके लक्षण है।
डिप्रेशन के विभिन्न प्रकार
 
मेजर डिप्रेशन को मेजर डिप्रेसिव डिसऑर्डर भी कहते हैं। इस डिप्रेशन में व्यक्ति के मूड में बदलाव, दैनिक गतिविधि में कम रूचि जैसी चीजें होती हैं। मेजर डिप्रेशन में इंसान की जिंदगी के हर पहलू जैसे काम-काज, व्यवहार, सोशल रिलेशनशिप सब पर प्रभाव पड़ता है। मेजर डिप्रेशन के लक्षणों का अनुभव 2 हफ्तों तक होता है। मेजर डिप्रेशन भी कई प्रकार के होते है।
  1. मैलनकोलिआ: इस तरह के डिप्रेशन में इंसान में शारीरिक बदलाव नजर आते हैं जैसे- इंसान का बहुत धीरे चलना। साथ ही मन भी उदास रहता है और व्यक्ति को महसूस ऐसा महसूस होता है जैसे सब कुछ खो गया हो।
  2. मानसिक डिप्रेशन: कभी-कभी डिप्रेशन से ग्रसित लोगों को वास्तविक और मानसिक अनुभव के साथ संपर्क खो सकते हैं। मानसिक डिप्रेशन में लोगों को ऐसा महसूस होने लगता है कि वह बहुत बुरे हैं और सभी लोग उनका पीछा कर रहे हैं। उनको ऐसा भी लगता है जैसे सारे लोग उनके खिलाफ हैं। जिससे वह बीमार हो जाते हैं और कुछ गलत कर लेते हैं।
  3. एंटीनेटल और पोस्टनैटल डिप्रेशन: महिलाओं में प्रेग्नेंसी के दौरान डिप्रेशन में जाने का डर ज्यादा होता है। बच्चे के जन्म के बाद जब महिला डिप्रेशन में जाती है तो ये काफी समय तक के लिए होता है। जिसका प्रभाव सिर्फ महिला पर होता है। इसका बच्चे या घरवालों के साथ संबंध पर कोई असर नहीं पड़ता है। बच्चे के जन्म के कुछ समय बाद महिलाएं बेबी ब्लू का अनुभव करती हैं। बच्चे के जन्म के बाद कुछ दिनों तक बहुत ज्यादा भावनात्मक महसूस करने को बेबी ब्लू कहते हैं। इससे 80 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं ग्रसित होती हैं।
  4. बाइपोलर डिसऑर्डर: बाइपोलर डिसऑर्डर को मैनिक डिप्रेशन भी कहते हैं। इस तरह के डिप्रेशन में इंसान को जल्दी गुस्सा आता है साथ ही मूड भी अचानक से खुशनुमा तो कभी एक दम से शांत भी हो जाता है। कुछ लोगों को तो ऐसा लगता है कि उनके पास सुपर पावर आ गई हैं और साथ ही चिड़चिड़े भी हो जाते हैं।
  5. साइक्लोथमिक डिसऑर्डर: इस तरह के डिप्रेशन में लोगों को कम से कम दो सालों तक इसका अनुभव होता है और कोई भी बदलाव दो महीने से ज्यादा नहीं होता हैं। हर महीने व्यक्ति के मूड या शारीरिक गतिविधियों में बदलाव आते रहते हैं। इसके लक्षण कम समय तक रहते हैं साथ ही यह कम गंभीर और अनियमित होते हैं।
  6. डिस्थ्यिमिक डिसऑर्डर: इस तरह के डिप्रेशन में व्यक्ति 1 या 2 साल से ज्यादा वक्त रहता है। इसके लक्षण गंभीर नहीं होते लेकिन व्यक्ति को अपने रोज के काम करने में मुश्किल होती है। साथ ही वह अपने आप को अस्वस्थ भी महसूस करता है।
  7. सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर: know about different types of depressionइस तरह का डिप्रेशन मौसम के अनुसार होता है। ठंड में सूर्य से मिलने वाली ऊर्जा की मात्रा कम हो जाने के कारण कुछ लोग डिप्रेशन में चले जाते हैं। सीजनल डिप्रेशन में लोग ज्यादा सोते हैं, ज्यादा खाते हैं जिसके कारण उनका वजन बढ़ जाता है।
कैसे बनता हैं अवसाद का कारक चंद्रमा
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार ज्योतिष शास्त्र चूंकि व्यक्ति के रोजमर्रा के जीवन के हर पहलू पर असर रखता है, तो स्वाभाविक रूप से इस समस्या का समाधान भी प्रस्तुत करता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार किसी भी जातक की कुंडली देखकर यह आसानी से जाना जा सकता है कि वह अवसाद या डिप्रेशन का शिकार है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की जन्म कुंडली का पहला घर मस्तिष्क का प्रतिनिधित्व करता है और चंद्रमा को मस्तिष्क और भावनाओं का स्वामी माना जाता है। यदि जातक के जन्मांग चक्र के प्रथम भाव में चंद्रमा नीच का हो या पाप ग्रहों से युक्त हो तो ऐसी स्थिति जीवन में डिप्रेशन लाती है।
नींद न आना, नींद आये तो ज्यादा आये,रात को सोते हुए उठ कर चलना,आलस्य,आंख के देले की बीमारिया , कफ्ह,सर्दी के कारन बुखार,भूख न लगना,पीलिया,खून खराबी,जल से डर लगना,चित की थकावट ,किसी काम में मन न लगना,महिलाओ सम्बन्धी,इस्त्रियो का मासिक धरम का नियमत न होना,अनीमिया,आदि |
डिप्रेशन/अवसाद की बीमारी किसी भी आयु के व्यक्ति को कभी भी हो सकती है, परंतु इस रोग के किशोरावस्था के जातक तथा स्त्रियां अधिक शिकार होती हैं। इस रोग का केंद्र बिन्दु मन है और मन भावुक व्यक्ति को अपनी चपेट में जल्दी लेता है।
स्त्रियों को सृष्टि ने पुरुषों की तुलना में अधिक भावुक बनाया है परन्तु आधुनिक परिवेश में देखा जाए तो इसका भी अपवाद है। दूसरा किशोरावस्था के जातक इस रोग की चपेट में अधिक आते हैं, क्योंकि उनका मन अपने आगामी भविष्य के कल्पनीय स्वप्न संजोने लगता है। स्वप्नों की असीमित उड़ान के पश्चात जब यथार्थ के ठोस धरातल से उनका सामना होता है तो मन अवसाद ग्रस्त होने लगता है।
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार डिप्रैशन जैसे मानसिक रोगों का केन्द्र बिन्दु मन है। मन शरीर का बहुत ही सूक्ष्म अवयव है, लेकिन आन्तरिक एवं बाह्य सभी प्रकार की क्रियाओं को यही प्रभावित करता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार अवसाद यानी डिप्रैशन मूल रूप से मस्तिष्क में रासायनिक स्राव के असंतुलन के कारण होती है, किन्तु वैदिक ज्योतिष अनुसार इस रोग का दाता, मन को संचालित करने वाला ग्रह चन्द्रमा तथा व्यक्ति की जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव के स्वामी को माना जाता है।
चंद्र के प्रत्यक्ष प्रभावों से तो आप सभी भलीभान्ति परिचित हैं। पृथ्वी के सबसे नजदीक होने से व्यक्ति के मन को सर्वाधिक प्रभावित यही ग्रह करता है, क्योंकि ज्योतिष में चंद्रमा का पूर्ण सम्बन्ध हमारे मानसिक क्रिया-कलापों से है। यदि चंद्रमा या चतुर्थेश नीच राशि में स्थित हो, अथवा षष्ठेश के साथ युति हो या फिर राहू या केतु के साथ युति हो कर कुंडली में ग्रहण योग निर्मित हो रहा हो तो इस रोग की उत्पत्ति होती है। इसके अतिरिक्त द्वादशेश का चतुर्थ भाव में स्थित होना भी व्यक्ति के मानसिक असंतुलन का कारक है।
अवसाद से मुक्ति के लिए सबसे पहले तो पीड़ित व्यक्ति का वातावरण परिवर्तित कर देना चाहिए, लेकिन यह समझ लेना भी गलत होगा कि सिर्फ वातावरण के परिवर्तन से रोग मुक्ति संभव है। इसके अतिरिक्त उसके आत्मविश्वास को जगाने का प्रयास करते रहना चाहिए, साथ ही कुछ उपाय भी इसके निवारणार्थ हैं जिसमें पीड़ित जातक को चांदी के पात्र (गिलास आदि) में पेय पदार्थों का सेवन करना चाहिए।
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार सोमवार तथा पूर्णिमा की रात्रि को चावल, दूध, मिश्री, सफेद वस्त्र व वस्तुओं इत्यादि का दान करना चाहिए। हरे रंग का परित्याग करें। चांदी में मढ़वा कर गले में द्विमुखी रुद्राक्ष धारण करें, साथ ही नित्य कच्चे दूध में सफेद चन्दन घिस कर मस्तक पर उसका तिलक करें । पूर्णिमा को चन्द्र देव को कच्चा दूध मिश्रित जल से अर्घ्य देना शुभ रहता है।
डिप्रेशन जैसे मानसिक रोगों का केन्द्रबिन्दु मन है। मन जो कि शरीर का बहुत ही सूक्ष्म अव्यव होता है,लेकिन आन्तरिक एवं बाह्य सभी प्रकार की क्रियायों को यही प्रभावित करता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार अवसाद(डिप्रेशन)मूल रूप से मस्तिष्क में रसायनिक स्त्राव के असंतुलन के कारण होता है,किन्तु वैदिक ज्योतिष अनुसार इस रोग का दाता, मन को संचालित करने वाला ग्रह चन्द्रमा तथा व्यक्ति की जन्मकुंडली में चतुर्थ भाव के स्वामी को माना जाता है। चंद्र के प्रत्यक्ष प्रभावों से तो आप सभी भलीभान्ती परिचित हैं। पृथ्वी के सबसे नजदीक होने से व्यक्ति के मन को सर्वाधिक प्रभावित यही ग्रह करता है,क्योंकि ज्योतिष में चंद्रमा का पूर्ण सम्बंध हमारे मानसिक क्रियाकलापों से है। अगर चंद्रमा या चतुर्थेश(Lord of 4th house) नीच राशी में स्थित हो, अथवा षष्ठेश(Lord of 6th house)के साथ युति हो,या फिर राहू या केतु के साथ युति होकर कुंडली में ग्रहण योग निर्मित हो रहा हो तो इस रोग की उत्पति होती है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार इसके अतिरिक्त द्वादशेश(Lord of 12th house) का चतुर्थ भाव में स्थित होना भी व्यक्ति के मानसिक असंतुलन का द्योतक है।अवसाद से मुक्ति के लिए सबसे पहले तो पीडित व्यक्ति का वातावरण परिवर्तित कर देना चाहिए,लेकिन यह समझ लेना भी गलत होगा कि सिर्फ वातावरण के परिवर्तन से रोग मुक्ति संभव है। इसके अतिरिक्त उसके आत्मविश्वास को जगाने का प्रयास करते रहना चाहिए, साथ ही कुछ महत्वपूर्ण सुझाव तथा उपाए भी इसके निवारणार्थ यहां दिए जा रहे हैं |
डिप्रेशन में सबसे जरूरी आध्यात्मिक जागरूकता 
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार आध्यात्मिक ज्ञान डिप्रेशन से गुज़र रहे व्‍यक्‍ति की सहायता कर सकता है;  व्यक्ति जब अत्याधिक निरूत्साहित हो जाता हैं कि वे आत्महत्या करना चाहते हैं  वे व्यक्ति जो डिप्रेशन से त्रस्त हैं, केवल अंधकार में ही नहीं डूबे रहते, वे अनेक प्रकार के आंतरिक कोलाहलों का सामना करते हैं जो उन्हें शारीरिक रूप से नुकसान पहुँचाते हैं। इसे उद्वेग कहते हैं। उद्वेग तब शुरू होता है जब प्रत्येक चीज़ की अति हो जाती है, जब चीज़ें सीमाओं से परे हो जाती हैं। जब व्यक्ति स्वयं को या अन्य व्यक्ति को नुकसान पहुँचाता है, यह सब इसलिए होता है क्योंकि वह उद्वेग को अनुभव कर रहा होता है। जब व्यक्ति डिप्रेशन का शिकार हो रहा हो, वह अपना अंदरुनी प्रकाश खो चुका होता है। उसका आत्मज्ञान उसके उद्देश्य के साथ लुप्त हो चुका होता है। वे विश्वास करना शुरू कर देते हैं कि प्रकाश कभी दोबारा वापस नहीं आएगा। लेकिन एक आशा है और यह आशा उस सुंदर ज्ञान में है जिसे एक सच्‍चा आध्‍यात्‍मिक गुरू ही दे सकता है, आध्यात्मिक विज्ञान इतना दैवीय है कि यह केवल उस व्यक्ति को, जो डिप्रेशन से गुज़र रहा हो, सांत्वना ही नहीं देता बल्कि सारी समस्याओं का निवारण करता है।
ज्योतिषीय  काउंसलिंग अर्थात ज्योतिषीय परामर्श मनोविज्ञान कैसे करता है अपना काम ?
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की लगभग हर प्रकार का मनोरोग  में मानसिक तनाव से पैदा होता है तनाव से रात्रि में नींद नहीं आती है नींद  न आने से पेट साफ नहीं रहता है अर्थात कब्ज रहता है कब्ज से गैस बनती है वही गन्दी वायु (गैस) हृदय में जाती है तो घबड़ाहट पैदा करती है उलटी लगती है धड़कन बढ़ा देती है और शिर में चढ़ती है तो शिर दर्द होता है चक्कर आता है कई बार ऐसी ही मिली जुली सभी परिस्थितियों से रक्त चाप अर्थात ब्लड प्रेशर बढ़ने लगता है ।
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार  मनोरोग  वह बीमारी है जो हमारी बढ़ी हुई महत्वाकाँक्षा से  पैदा होती है अर्थात हम जो और जैसा पाना या करना चाहते हैं या जैसा चाहते हैं वो और वैसा न हो पाने पर हमें तनाव होता है यह तनाव जिसका जैसा समय होता है उस पर वैसा प्रभाव करता है जिनका समय जितना ठीक होता है वो ऐसे तनावों से उतना लड़ पाने में सक्षम होते हैं अर्थात तनाव को उतना सह  पाते हैं कई लोगों का समय बहुत अच्छा होता है उन पर तनाव का असर बिलकुल कम होता है।
अवसाद लाइलाज रोग नहीं है। इसके पीछे जैविक, आनुवांशिक और मनोसामाजिक कारण होते हैं। यही नहीं जैवरासायनिक असंतुलन के कारण भी अवसाद घेर सकता है। इसकी अधिकता के कारण रोगी आत्महत्या तक कर सकते हैं।
इसलिए परिजनों को सजग रहना चाहिए और उनके परिवार का कोई सदस्य गुमसुम रहता है, अपना ज्यादातर समय अकेले में बिताता है, निराशावादी बातें करता है तो उसे तुरंत किसी अच्छे मनोचिकित्सक के पास ले जाएं। उसे अकेले में न रहने दें। हंसाने की कोशिश कर अवसाद अक्सर दिमाग के न्यूरोट्रांसमीटर्स की कमी के कारण भी होता है। न्यूरोट्रांसमीटर्स दिमाग में पाए जाने वाले रसायन होते हैं जो दिमाग और शरीर के विभिन्न हिस्सों में तारतम्यता स्थापित करते हैं। इनकी कमी से भी शरीर की संचार व्यवस्था में कमी आती है और व्यक्ति में अवसाद के लक्षण दिखाई देते हैं। इस तरह का अवसाद आनुवांशिक होता है। अवसाद के कारण निर्णय लेने में अड़चन, आलस्य, सामान्य मनोरंजन की चीजों में अरुचि, नींद की कमी, चिड़चिड़ापन या कुंठा व्यक्ति में दिखाई पड़ते हैं। अवसाद के कारणों में इसका एक पूरक चिंता (एंग्ज़ायटी) भी है।
इसके उपचार में योगासन में प्राणायाम बहुत सहायक सिद्ध हुआ है। कई बार अतिरिक्त चिड़चिड़ापन, अहंकार, कटुता या आक्रामकता अथवा नास्तिकता, अनास्था और अपराध अथवा एकांत की प्रवृत्ति पनपने लगती है या फिर व्यक्ति नशे की ओर उन्मुख होने लगता है। ऐसे में जरूरी है कि हम किसी मनोचिकित्सक से संपर्क करें। व्यक्ति को खुशहाल वातावरण दें। उसे अकेला न छोड़ें तथा छिन्द्रान्वेषण कतई न करें। उसकी रुचियों को प्रोत्साहित कर, उसमें आत्मविश्वास जगाएँ और कारण जानने का प्रयत्न करें। अमेरिका के कुछ वैज्ञानिकों ने गहन शोध के बाद यह दावा किया है कि यदि कोई व्यक्ति लगातार सकारात्मक सोच का अभ्यास करता है, तो वह उसके डिप्रेशन या अवसाद की स्थिति का एकमात्र इलाज हो सकता है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ फैमेली फिजिशियन का कहना है कि लोगों को नकारात्मक नहीं सोचना चाहिए। न ही विफलता के भय को लेकर चिंतित होते रहना चाहिए। इनकी बजाय हमेशा सकारात्मक सोच दिमाग में रखना चाहिए जो होगा अच्छा होगा।
घर में अन्य सदस्यों को अवसाद की बीमारी होने से भी यह परेशानी महिलाओं को जल्दी पकड़ती है। क्योंकि घर से लगाव पुरुषों के मुकाबले उन्हें ज्यादा होता है। इसके चलते कभी-कभी उनमें आत्महत्या की इच्छा जोर मारने लगती है। इसलिए पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का अवसाद ज्यादा खतरनाक होता है। हालांकि मंदी और कॉम्पटीशन के दौर में डिप्रेशन अब युवाओं को भी अपना शिकार बनाने लगा है इसलिए कोशिश यह रखनी चाहिए कि आप खुशनुमा पलों की तलाश करें और सकारात्मक सोच रखें। इससे बचने के उपायों में व्यस्त रहकर मस्त रहना, अपने लिए समय निकालना, संतुलित आहार सेवन, अपने लिए समय निकालना और सामाजिक मेलजोल बढ़ाना मूल उपाय हैं।
मनोरोगी केवल अपनी समस्या का समाधान चाहता है और केवल उसी विषय में सुनना चाहता है और कोई बात उसे पसंद ही नहीं होती है । इसलिए यहाँ एक बात सबसे जरूरी और विशेष रूप से ध्यान देने योग्य होती है कि एक जैसा मानसिक तनाव अलग अलग लोगों पर अलग अलग प्रकार से असर करता है अर्थात जिसका समय जितना प्रतिकूल या हानि कारक होता है उस  पर उतना अधिक असर होता है इसलिए अधिकाँश लोगों का यह फार्मूला कतई ठीक नहीं है कि किसी मनोरोगी के समय का सम्यक रूप से अध्ययन किए बिना ही आप बीती या औरों पर बीती बातें बता बता कर उसे समझाने लग जाना ! ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार ऐसा करने का असर कुछ तो होता है किन्तु बहुत नहीं होता है क्योंकि समझने वाले को उसकी मनोदशा एवं उसके समय की स्थिति का ज्ञान बिलकुल ही नहीं होता है और समय का अध्ययन ऐसे केसों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है इसके लिए  ज्योतिष शास्त्र के अध्ययन की आवश्यकता होती है क्योंकि ज्योतिष शास्त्र के अलावा समय के अध्ययन का और कोई विकल्प है ही नहीं इसलिए ज्योतिष विशेषज्ञों की राय के अनुसार मनोरोगियों की चिकित्सा की जाए तो ऐसी चिकित्सा का असर और अधिक शीघ्र एवं प्रभावी होता है
अवसाद (डिप्रेशन से प्रभावित लोगों के आम लक्षण) के निम्न लक्षण दिखायी देते हैं –
  • दुःख का लगातार अनुभव
  • लगातार उर्जा में कमी
  • नींद में कठिनाई
  • भूख में कमी
  • वजन का घटना
  • सिरदर्द का रहना लगातार
  • अपच कब्ज रहना
  • ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार बात बात पर रोना और आत्महत्या की इच्छा होना |
  • अवसाद के चलते व्यक्ति का न सिर्फ मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य बल्कि शारीरिक स्‍वास्‍थ्‍य भी बिगड़ने लगता है।
  • अवसाद में रहते हुए व्यक्ति की आत्महत्या की इच्छा प्रबल होने लगती है।
  • ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार व्यक्ति के मन में हीनभावना होना, कुण्ठा पनपना, अपने को दूसरों से कम आंकना, तनाव लेना सभी अवसाद के लक्षण है।
  • व्यक्ति अवसाद के कारण अपने काम पर सही तरह से फोकस नहीं कर पाता।
  • ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार कुछ समय पहले के आंकड़ो पर गौर करें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया के ज्यादातर बड़े शहरों में डिप्रेशन की समस्या का बहुत तेजी से विस्तार हुआ है। भारत जैसे विकासशील देशों में 10 पुरुषों में से एक व 5 महिलाओं में से एक अपनी जिंदगी के किसी न किसी पड़ाव पर डिप्रेशन का शिकार बनते हैं…
  • कोई व्यक्ति अवसाद से ग्रसित रहता है तो उसे डिमेंशिया होने की आशंका अधिक बढ़ जाती है।
  • अवसाद से हृदय और मस्तिष्क को भी भारी खतरा उत्पन्न हो सकता है।
  • अवसाद और मधुमेह से पीड़ित लोगों में दिल से जुड़ी बीमारियां, अंधापन और मस्तिष्क से जुड़ी बीमारियां होने की आशंका बनी रहती है।
  • डिप्रेशन से हार्ट डिज़ीज जैसे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।
  • इम्यून सिस्टम पर अतिरिक्त असर पड़ता है।
  • मानसिक बीमारी से हृदय संबंधी बीमारी के चलते मौत का खतरा 75 साल की उम्र तक दो गुना अधिक होता है।
  • अवसाद से व्यक्ति किसी पर जल्दी से भरोसा नहीं कर पाता।
  • ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार वह अधिक गुस्सेवाला और चिड़चिड़ा हो जाता है।
डिप्रेशन के कुछ ऐसे लक्षण जिनमें प्रोफेशनल ट्रीटमेंट की तुरन्त आवश्यकता होती है:—
  • ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार मरने या आत्महत्या की कोशिश करना। यह बहुत ही खतरनाक स्थिति है, ऐसी स्थिति में प्रोफेशनल थेरेपिस्ट से सम्पर्क करना बहुत ज़रूरी हो जाता है।
  • जब डिप्रेशन के लक्षण लम्बे समय तक दिखें।
  • आपके काम करने की शक्ति दिन पर दिन क्षिण होती जा रही है।
  • आप दुनिया से कटते जा रहे हैं।
  • ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार डिप्रेशन का इलाज सम्भव है। इस बीमारी में व्यक्ति का शारीरिक से ज़्यादा मानसिक रूप से स्वस्थ होना ज़रूरी होता है। ऐसी स्थिति में ऐसा मित्र बनायें जो आपकी बातों को समझ सके और अकेले कम से कम रहने की कोशिश करें।
इसके दुष्प्रभाव
  • हृदय जन्य बीमारीयाँ
  • अस्थमा का दौरा आना
  • त्वचा की बीमारी होना
  • शरीर मे खून की कमी हो जाना
  • चश्मा लगना
  • और भी जाने कई सारी बीमारीयाँ।
अब यह किसी एक वर्ग को हो यह जरुरी नही है। पढने वाले बच्चे परीक्षा के डर से , या नम्बर कम आने के डर से इस अवस्था में आ जाते हैं .महिलायें पुरूष कोई भी किस समय इस का शिकार हो जाए कौन जाने|अवसाद रोगियों के लिए प्राकतिक चिकित्सा ,रेकी , ऊर्जा चिकित्सा आशा की किरण है |
यदि आप डिप्रेशन से बचना चाहते हैं तो यह उपाय करें
  • रोगी को चांदी के पात्र (गिलास आदि) में जल,शर्बत इत्यादि शीतल पेय पदार्थों का सेवन करना चाहिए।
  • सोमवार तथा पूर्णिमा की रात्री को चावल,दूध,मिश्री,चंदन लकडी,चीनी,खीर,सफेद वस्त्र,चांदी इत्यादि वस्तुओं का दान करना चाहिए।
  • आशावादी बनें। प्रत्येक स्थिति में आशावादी दृ्ष्टिकोण अपनाऎं। अपनी असफलताओं को नहीं वरन सफलताओं को याद करें।
  • हरे रंग का परित्याग करें।
  • चाँदी में मंडवाकर गले में द्विमुखी रूद्राक्ष धारण करें, साथ ही नित्य प्रात: कच्चे दूध में सफेद चन्दन घिसकर मस्तक पर उसका तिलक करें।
  • ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार कभी भी खाली न बैठे क्यों कि अगर आप खाली बैठेंगे तो मन को अपनी उडान भरने का समय मिलेगा,जिससे भांती भांती के कुविचार उत्पन होने लगेंगे।
  • डिप्रेशन से परेशान जातकों को सोमवार का व्रत रखने से लाभ होता है।
  • चंद्रमा के कमजोर होने की स्थिति में भगवान शिव की पूजा का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। शिवलिंग पर जल चढ़ाने के भी उत्तम परिणाम सामने आते हैं।
  • जातक को अधिक से अधिक चांदी के आभूषण पहनने चाहिए। याद रखें कि इन आभूषणों में कहीं जोड़ ना हो और इन्हें सोमवार के दिन ही धारण करें।
  • ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्रीने बताया की  हिंदू शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव चंद्रमा के स्वामी माने जाते हैं। इसलिए डिप्रेशन में भगवान शिव की पूजा का विशेष लाभदायक प्रभाव देखने को मिलता है। ऐसे में जातक को 108 बार ओम नमः शिवाय का जाप करने का निर्देश दिया जाता है। यदि आप ध्यान एकाग्र ना कर पा रहे हों, तो शांत मन से शिव चालीसा भी पढ़ सकते हैं। शिव जी की पूर्ण भक्ति से की गई साधना का प्रभाव सभी नकारात्मक प्रभावों को दूर करता है।
  • योग और प्राणायाम से भी डिप्रेशन दूर करने में मदद मिलती है। विशेष रूप से अनुलोम विलोम का अभ्यास दवा की तरह प्रभावी माना जाता है। 10 मिनट के लिए ओम शब्द के जाप से भी सकारात्मक परिणाम देखने को मिलते हैं।
  • ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार भारतीय संस्कृति में मां को भगवान माना जाता है। यदि आप डिप्रेशन में हैं तो अपनी मां से खुलकर और अधिक से अधिक बात करें। यदि दुर्भाग्य से मां ना हों, तो किसी भी अधिक आयु की महिला, जो आपकी आत्मीय हो, उससे बात करें। हर सोमवार को उस महिला को सफेद फूल, सफेद मिठाई, सफेद वस्त्र, दूध, शक्कर जैसी कोई भी सफेद वस्तु भेंट करें।
  • हो सके तो बेहतर मनोंरंजक साहित्य पढें,सिद्ध पुरूषों के प्रवचन सुनें,व्यायाम-योग-ध्यान साधना इत्यादि विधियों को अपनाऎं।
  • उपरोक्त उपायों एवं सुझावों को अपनाएं तथा अपने घर परिवार,समाज के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करें,दूसरों की खुशियों में अपने लिए खुशियां ढूंढने का प्रयास करें……….जिससे आपका जीवन भी खुशियों से महके उठे।
  • प्रतिदिन सुबह नित्य कर्मों से निवृत्त होकर तुलसी के पौधे की 11 परिक्रमा करें और घी का दीपक जलाएं। तुलसी के पौधे को जल चढ़ाएं। यही प्रक्रिया शाम को समय भी करें। ऐसा करने से मानसिक अवसाद कम होगा। तुलसी का माला धारण करें तो और भी बेहतर लाभ मिलेगा।
  • समय समय पर आत्म विश्लेषण करते रहें।
  • मेडिटेशन जरूर करें।
  • ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार अंगूठे और पहली उंगली यानी इंडैक्स फिंगर के पोरों को आपस में जोडऩे पर ज्ञान मुद्रा बनती है। इस मुद्रा को रोज दस मिनट करने से मस्तिष्क की दुर्बलता समाप्त हो जाती है। साधना में मन लगता है। ध्यान एकाग्रचित होता है। इस मुद्रा के साथ यदि मंत्र का जाप किया जाय तो वह सिद्ध होता है। परमानन्द की प्राप्ति होती है। इसी मुद्रा के साथ तो ऋषियों मनीषियों तपस्वियों ने परम ज्ञान को प्राप्त किया था।
  • लाभ- मानसिक क्षमता बढ़ती है।
  • इस मुद्रा को करने से पागलपन, अनेक प्रकार के मनोरोग दूर होते हैं।
  • चिड़चिड़ापन, गुस्सा, चंचलता, लम्पटता, अस्थिरता, चिंता से मुक्ति मिलती है।
  • भय, घबराहट, व्याकुलता, अनिद्रा रोग, डिप्रेशन आदि से छुटकारा मिलता है।
  • याददाश्त व एकाग्रता में वृद्धि होती है।
|| शुभम भवतु ||
|| कल्याण हो ||

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