जानिये सन्तान-प्राप्ति के लिए विभिन्न उपाय तथा अचूक मत्रों का प्रयोग—
(Mantra for Pregnancy)—–(एक प्रयास संकलन का )

जिस परिवार के दम्पति सुविचारी, सदाचारी एवं पवित्रात्मा हैं तथा शास्त्रोक्त नियमों के पालन में तत्पर हैं ऐसे दम्पति के घर में दिव्य आत्माएं जन्म लेती हैं | ऐसी सन्तानों में बचपन से ही सुसंस्कार, सदगुणों के प्रति आकर्षण एवं दिव्यता देखी जाती है |वर्त्तमान में देश के सामने बालकों में संस्कारों की कमी यह एक प्रमुख समस्या है, जिससे उबरने ले हेतु सन्तानप्राप्ति के इच्छुक दम्पति को ब्रह्मज्ञानी सन्तों-महापुरुषों के दर्शन-सत्संग का लाभ लेकर स्वयं सुविचारी, सदाचारी बनना चाहिए, साथ ही उत्तम सन्तानप्राप्ति के नियमों को भी जान लेना चाहिए|
वास्तव में पत्थर, पानी, खनिज देश की सच्ची सम्पत्ति नहीं हैं अपितु ॠषि-परम्परा के पवित्र संस्कारों से सम्पन्न तेजस्वी बालक ही देश की सच्ची सम्पत्ति हैं लेकिन मनुष्य धन-सम्पत्ति बढ़ाने में जितना ध्यान देता है उतना सन्तान पैदा करने में नहीं देता | यदि शास्त्रोक्त रीति से शुभ मुहूर्त में गर्भाधान कर सन्तानप्राप्ति की जाय तो वह परिवार व देश का नाम रोशन करनेवाली सिद्ध होगी |
उत्तम सन्तानप्राप्ति के लिए सर्वप्रथम पत-पत्नी का तन-मन स्वस्थ होना चाहिए | वर्ष में केवल एक ही बार सन्तानोत्पत्ति हेतु समागम करना हितकारी है |
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सन्तान-प्राप्ति के लिए अचूक प्रयोग—-वंशाख्य कवच—-
अरुण उवाच-भगवन्, देव-देवेश! कृपया त्वं जगत्-प्रभो! वंशाख्य-कवचं ब्रूहि, मह्यं शिष्याम तेऽनघ! यस्य प्रभावाद् देवेश! वंशच्छेदो न जायते।
श्रीसूर्य उवाच- श्रृणु वत्स! प्रवक्ष्यामि, वंशाख्य-कवचं शुभं। सन्तान-वृद्धिर्यात् पाठात्, गर्भ-रक्षा सदा नृणां।। वन्ध्याऽपि लभते पुत्रं, काक-वन्ध्या सुतैर्युता। मृत-गर्भा स-वत्सा स्यात्, स्रवद्-गर्भा स्थिर-प्रजा।। अपुष्पा पुष्पिणी यस्य, धारणं च सुख-प्रसुः। कन्या प्रजा-पुत्रिणी स्यात्, येन स्तोत्र-प्रभावतः। भूत-प्रेतादि या बाधा, बाधा शत्रु-कृताश्च या।। भस्मी-भवन्ति सर्वास्ताः, कवचस्य प्रभावतः। सर्वे रोगाः विनश्यन्ति, सर्वे बाधा ग्रहाश्च ये।।
।।मूल-पाठ।।
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीवंशाख्य-कवच-माला-मन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः। अनुष्टुप् छन्दः। श्रीसूर्यो देवता। वंश-वृद्धयर्थे जपे विनियोगः।
ऋष्यादि-न्यास- ब्रह्मा-ऋषये नमः शिरसि। अनुष्टुप्-छन्दसे नमः मुखे। श्रीसूर्य-देवतायै नमः हृदि। वंश-वृद्धयर्थे विनियोगाय नमः सर्वांगे।
कवच-
पूर्वे रक्षतु वाराही, चाग्नेयामम्बिका स्वयम्। दक्षिणे चण्डिका रक्षेत्, नैऋत्यां शव-वाहिनी।
पश्चिमे कौमुदा रक्षेत्, वायाव्यां च महेश्वरी। उत्तरे वैष्णवी रक्षेत्, ईशाने सिंह-वाहिनी।।
ऊर्घ्वं तु शारदा रक्षेत्, अधो रक्षतु पार्वती। शाकम्भरी शिरो रक्षेत्, मुखं रक्षतु भैरवी।।
कण्ठं रक्षतु चामुण्डा, हृदयं रक्षेच्छिवा। ईशानी च भुजौ रक्षेत्, कुक्षौ नाभिं च कालिका।।
अपर्णा उदरं रक्षेत्, कटि-वस्ती शिव-प्रिया। उरु रक्षतु वाराही, जाया जानु-द्वयं तथा।।
गुल्फौ पादौ सदा रक्षेत्, ब्रह्माणी परमेश्वरी। सर्वांगानि सदा रक्षेत्, दुर्गा दुर्गार्ति-नाशिनी।।
मन्त्र- “नमो देव्यै महा-देव्यै सततं नमः। पुत्रं सौख्यं देहि देहि, गर्भ रक्षा कुरुष्व नः।। ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं श्रीं ऐं ऐं ऐं महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती-रुपायै नव-कोटि-मुर्त्त्यै सुर्गा-देव्यै नमः। ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं दुर्गे दुर्गार्ति-नाशिनी! सन्तान-सौख्यं देहि देहि, वन्ध्यत्वं मृत वत्सत्वं हा हा गर्भ रक्षां कुरु कुरु, सकलां बाधां कुलजां वासजां कृतामकृतां च नाशय नाशय, सर्व-गात्राणि रक्ष-रक्ष, गर्भ पोषय पोष्य, सर्वं रोगं शोषय, आशु दीर्घायु-पुत्रं देहि देहि स्वाहा।।”
प्रयोग विधिः- उक्त वंशाख्य कवच का प्रयोग सन्तान प्राप्ति के लिए किया जाता है।
प्रयोग के समय सन्तान की इच्छा रखनेवाली स्त्री का ‘ऋतु-काल′ होना चाहिए। ‘ऋतु-स्नान’ के दिन ही रात्रि-काल में यह प्रयोग किया जाता है। सर्व-प्रथम ‘पीपल′ के सात पत्तों पर अनार की कलम द्वारा ‘रक्त-चन्दन’ से मन्त्र को लिखें। फिर दो छटाँक सरसों के तेल में उक्त सात पीपल के पत्तों को धो डाले। ऐसा करने से तेल में मन्त्र का प्रभाव चला जाएगा। अब पुनः ‘पीपल′ के सात पत्तों पर अनार की कलम से मन्त्र को लिखें और उन पत्तों को स्नान करने के जल में डाल दें।
इसके बाद रात्रि-काल में वह स्त्री किसी निर्जन स्थान में जाकर उस सरसों के तेल को अपने पूरे शरीर में लगा ले। शरीर का कोई भी बाघ तेल लगने से नहीं छूटना चाहिए। तेल लगाने के बाद उसी स्थान में स्नान करने वाले जल से, जिसमें पीपल के पत्ते डाले गए हैं, स्नान कर लें। जो भी पुराने वस्त्र हों, उन्हें वहीं उसी स्थान में छोड़ दें। वहाँ से कुछ दूर हट कर नये वस्त्र पहन लें। तब घर वापस आ जाए। घर में पुरोहित, ब्राह्मण या कोई अभिभावक उक्त मन्त्र से १०८ बार कुश के द्वारा उस स्त्री को झाड़े। झाड़ने के बाद उस स्त्री के शरीर की नाप के बराबर लाल धागा ले और उक्त मन्त्र को पढ़कर उस धागे में गाँठ बाँधकर उसकी कमर में बाँध दे। उस रात्रि पुरुष के साथ प्रसंग आवश्यक है।
Note- Yauwanbhringa Vanaspati Ras and Shaktishila Beez Must in this Sadhna without that items this prayog will not give you results.
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हमारे पुराने आयुर्वेद ग्रन्थों में पुत्र-पुत्री प्राप्ति हेतु दिन-रात, शुक्ल पक्ष-कृष्ण पक्ष तथा माहवारी के दिन से सोलहवें दिन तक का महत्व बताया गया है। धर्म ग्रन्थों में भी इस बारे में जानकारी मिलती है।
यदि आप पुत्र प्राप्त करना चाहते हैं और वह भी गुणवान, तो हम आपकी सुविधा के लिए हम यहां माहवारी के बाद की विभिन्न रात्रियों की महत्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं।
चौथी रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र अल्पायु और दरिद्र होता है।
पांचवीं रात्रि के गर्भ से जन्मी कन्या भविष्य में सिर्फ लड़की पैदा करेगी।
छठवीं रात्रि के गर्भ से मध्यम आयु वाला पुत्र जन्म लेगा।
सातवीं रात्रि के गर्भ से पैदा होने वाली कन्या बांझ होगी।
आठवीं रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र ऐश्वर्यशाली होता है।
नौवीं रात्रि के गर्भ से ऐश्वर्यशालिनी पुत्री पैदा होती है।
दसवीं रात्रि के गर्भ से चतुर पुत्र का जन्म होता है।
ग्यारहवीं रात्रि के गर्भ से चरित्रहीन पुत्री पैदा होती है।
बारहवीं रात्रि के गर्भ से पुरुषोत्तम पुत्र जन्म लेता है।
तेरहवीं रात्रि के गर्म से वर्णसंकर पुत्री जन्म लेती है।
चौदहवीं रात्रि के गर्भ से उत्तम पुत्र का जन्म होता है।
पन्द्रहवीं रात्रि के गर्भ से सौभाग्यवती पुत्री पैदा होती है।
सोलहवीं रात्रि के गर्भ से सर्वगुण संपन्न, पुत्र पैदा होता है।
——व्यास मुनि ने इन्हीं सूत्रों के आधार पर पर अम्बिका, अम्बालिका तथा दासी के नियोग (समागम) किया जिससे धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर का जन्म हुआ। महर्षि मनु तथा व्यास मुनि के उपरोक्त सूत्रों की पुष्टि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपनी पुस्तक संस्कार विधि में स्पष्ट रूप से कर दी है। प्राचीनकाल के महान चिकित्सक वाग्भट तथा भावमिश्र ने महर्षि मनु के उपरोक्त कथन की पुष्टि पूर्णरूप से की है।´ दो हजार वर्ष पूर्व के प्रसिद्ध चिकित्सक एवं सर्जन सुश्रुत ने अपनी पुस्तक सुश्रुत संहिता में स्पष्ट लिखा है कि मासिक स्राव के बाद 4, 6, 8, .., 1., 14 एवं 16वीं रात्रि के गर्भाधान से पुत्र तथा 5, 7, 9, 11, 1. एवं 15वीं रात्रि के गर्भाधान से कन्या जन्म लेती है।
2500 वर्ष पूर्व लिखित चरक संहिता में लिखा हुआ है कि भगवान अत्रिकुमार के कथनानुसार स्त्री में रज की सबलता से पुत्री तथा पुरुष में वीर्य की सबलता से पुत्र पैदा होता है।
—–प्राचीन संस्कृत पुस्तक सर्वोदय में लिखा है कि गर्भाधान के समय स्त्री का दाहिना श्वास चले तो पुत्री तथा बायां श्वास चले तो पुत्र होगा।
—-यूनान के प्रसिद्ध चिकित्सक तथा महान दार्शनिक अरस्तु का कथन है कि पुरुष और स्त्री दोनों के दाहिने अण्डकोष से लड़का तथा बाएं से लड़की का जन्म होता है।
—–चन्द्रावती ऋषि का कथन है कि लड़का-लड़की का जन्म गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष के दायां-बायां श्वास क्रियाए पिंगला-तूड़ा नाड़ी, सूर्यस्वर तथा चन्द्रस्वर की स्थिति पर निर्भर करता है।
——–कुछ विशिष्ट पंडितों तथा ज्योतिषियों का कहना है कि सूर्य के उत्तरायण रहने की स्थिति में गर्भ ठहरने पर पुत्र तथा दक्षिणायन रहने की स्थिति में गर्भ ठहरने पर पुत्री जन्म लेती है। उनका यह भी कहना है कि मंगलवार, गुरुवार तथा रविवार पुरुष दिन हैं। अतः उस दिन के गर्भाधान से पुत्र होने की संभावना बढ़ जाती है। सोमवार और शुक्रवार कन्या दिन हैं, जो पुत्री पैदा करने में सहायक होते हैं। बुध और शनिवार नपुंसक दिन हैं। अतः समझदार व्यक्ति को इन दिनों का ध्यान करके ही गर्भाधान करना चाहिए।
——-जापान के सुविख्यात चिकित्सक डॉ. कताज का विश्वास है कि जो औरत गर्भ ठहरने के पहले तथा बाद कैल्शियमयुक्त भोज्य पदार्थ तथा औषधि का इस्तेमाल करती है, उसे अक्सर लड़का तथा जो मेग्निशियमयुक्त भोज्य पदार्थ जैसे मांस, मछली, अंडा आदि का इस्तेमाल करती है, उसे लड़की पैदा होती है।
——–विश्वविख्यात वैज्ञानिक प्रजनन एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. लेण्डरम बी. शैटल्स ने हजारों अमेरिकन दंपतियों पर प्रयोग कर प्रमाणित कर दिया है कि स्त्री में अंडा निकलने के समय से जितना करीब स्त्री को गर्भधारण कराया जाए, उतनी अधिक पुत्र होने की संभावना बनती है। उनका कहना है कि गर्भधारण के समय यदि स्त्री का योनि मार्ग क्षारीय तरल से युक्त रहेगा तो पुत्र तथा अम्लीय तरल से युक्त रहेगा तो पुत्री होने की संभावना बनती है।
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संतान प्राप्ति के उपाय——
जिस इस्त्री को गर्भ धारण न होता हो तो उस इस्त्री को ऋतु-काल के बाद नहा-धोकर मृगछाला पर पवित्र मन से बैठ कर मन मे संतान प्राप्ति का संकल्प करना चाहिए l फिर न्रिम मन्त्र को 108 बार पड़कर रात मे पति से संभोग करने से इस्त्री को गर्भ धारण होता है l
ॐ ह्रीं उलजाल्ये ठ ठ ॐ ह्रीं l 
ॐ नम : सिधि रुपाए अमुकी सपुष्य कुरु कुरु सवाहा l
इस मन्त्र को प्रयोग करने से पूर्व दस हजार बार जप कर सिद्ध कर लेना चाहिए l तत्पश्चात प्रयोग के समय शंखाहुली स्वरस सवा तोले की मात्रा मे लेकर उपरोक्त मन्त्र से 108 बार अभिमंत्रित कर बंध्या इस्त्री को पिलाना चाहिए l इस प्रकार अभिमंत्रित किये हुए शंखपुष्पी के ताजे स्वरस को नियम से प्रतिदिन एक सप्ताह तक पिलाना चाहिए और आठवे दिन इस्त्री सहवास करे तो गर्भ धारण करने की पूरी-पूरी संभावना रहती है l और संतान स्वस्थ रहती है l जब स्वरस को अभिमंत्रित कर जिस इस्त्री को पिलाना हो तो मन्त्र मे आये “अमुक ” शब्द के स्थान पर उस इस्त्री का नाम लेना चाहिए तथा इस स्वरस के सेवन क्रम मे इस्त्री को सदा ही सात्विक व सादा भोजन करना चाहिए तथा वस्त्र तन- मन से पवित्र रहकर सन्तान प्राप्ति हेतु इश्देव के ध्यान मे लीन रहना चाहिए l 
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केसे हो मनपसन्द संतान की प्राप्ति..?????
किस व्यक्ति के कैसी सन्तान होगी,इसका पता भी लगाया जा सकता है,जन्म कुन्डली में चलित नवमांश कारकांश के द्वारा जन्म योग है,या नहीं इसका पता लगाना तो असंभव तो नही परन्तु कठिन अवश्य है। संतान सुख का विचार करने के लिए त्रिकोण 1,5,9वें स्थान द्वितीय स्थान एकादश स्थान (2,11) से सन्तान सम्बन्धी विचार करना चाहिए।
जन्म कुन्डली का पहला भाव और इसके प्रभाव —-
देह भवन यानी शरीर स्थान यह सन्तान के वास्ते महत्वपूर्ण साधन है,जिससे प्रथम देह स्थान का बल होना देखना चाहिये। उसके बाद द्वितीय स्थान जहां कुटुम्ब वृद्धि या वंश वृद्धि का विचार करना चाहिये,उसके बाद पंचम स्थान से संतान सुख का विचार किया जाता है,पांचवें स्थान स पांचवे यानी नवम स्थान को भाग्य स्थान भी इसके लिये महत्वपूर्ण माना जाता है,फिऱ ग्यारहवां भाव जहां से किसी भी वस्तु की प्राप्ति होती है को देखना चाहिये। इसके साथ ही पुत्र कारक गुरु का भी विचार करना चाहिए। सप्तांश,नवमांश कारकांश यह कुन्डली में जन्म के इन पांचों स्थानों के स्वामी की क्या परिस्थिति है,उसका ध्यान होने के बाद सन्तान सम्बन्धी जातक को योग्य मार्गदर्शन देना चाहिये।
जानिए ग्रह का प्रभाव और संतान योग ——
सूर्य मंगल गुरु पुत्र के ग्रह होते है,चन्द्र स्त्री ग्रह है,बुध शुक्र शनि कुन्डली में बलवान होने पर पुत्र या पुत्री का अपने बल के अनुसार फ़ल देते है,सूर्य की सिंह राशि अल्प प्रसव राशि है,और सूर्य जब ग्यारहवें भाव रहकर पांचवें स्थान के सामने होता है,तो एक पुत्र से अधिक का योग नही बनता है,कभी कभी वंश वृद्धि में बाधा भी बनती है। परन्तु सूर्य से अधिक से अधिक एक ही पुत्र का सुख होता है,जब चन्द्र राशि कर्क उसके स्वामी के “चन्द्र कन्या प्रजावान” योग के लिये प्रसिद्ध माना जाता है,यानी चन्द्र राशि कर्क कन्या राशि की अधिकता के लिये माना जाता है। पांचवें स्थान में कर्क राशि को अगर ग्यारहवें भाव से शनि देखता हो तो जातक के सात पुत्रिया भी हो सकती है,और एक पुत्र का योग होता है,और वह पुत्र भी अल्पायु वाला कहा जाता है,लेकिन अगर कर्क राशि में जन्म नही है,तो पर्णाम उल्टा भी देखा जाता है,धनु लगन की कुन्डली में पांचवे स्थान से पुत्र सुख अधिक होता है,शनि पुत्र सुख नही देता है।
जन्म कुंडली में कम सन्तान योग——
पुत्र के सुख का अभाव तब होता है जब पंचम स्थान दूषित होता है,पंचम स्थान को अगर शनि राहु मंगल अगर कोई भी ग्रह दृष्टि दे रहा है,या पंचम के मालिक बारहवें भाव में है,या पंचम और धन स्थान में अशुभ ग्रहों का जोर या युति है तो सन्तान में पुत्र सुख नही मिल पाता है या बिलम्ब होता है , लेकिन कन्या संतान अवश्य मिलती है।
इस उपाय/तरीके से पायें मनचाही सन्तान प्राप्ति——
स्त्री के ऋतु चक्र के सोलह रात तक ऋतुकाल रहता है, उस समय में ही गर्भ धारण हो सकता है, उसके अन्दर पहली चार रातें निषिद्ध मानी जाती है, कारण दूषित रक्त होने के कारण कितने ही रोग संतान और माता पिता में अपने आप पनप जाते है, इसलिये शास्त्रों और विद्वानो ने इन चार रातों को त्यागने के लिये ही जोर दिया गया है। चौथी रात को ऋतुदान से कम आयु वाला पुत्र पैदा होता है, पंचम रात्रि से कम आयु वाली ह्रदय रोगी पुत्री होती है, छठी रात को वंश वृद्धि करने वाला पुत्र पैदा होता है, सातवीं रात को संतान न पैदा करने वाली पुत्री, आठवीं रात वाला पुत्र, नवीं रात को कुल में नाम करने वाली पुत्री, दसवीं रात को कुलदीपक पुत्र, ग्यारहवीं रात को अनुपम सौन्दर्य युक्त पुत्री,बारहवीं रात को अभूतपूर्व गुणों से युक्त पुत्र,तेरहवीं रात को चिन्ता देने वाली पुत्री,चौदहवीं रात को सदगुणी पुत्र,पन्द्रहवीं रात को लक्ष्मी समान पुत्री,और सोलहवीं रात को सर्वज्ञ पुत्र पैदा होता है। इसके बाद की रातों को संयोग करने से पुत्र संतान की गुंजायश नही होती है। इसके बाद स्त्री का रज अधिक गर्म हो जाता है,और पुरुष के वीर्य को जला डालता है, परिणामस्वरूप या तो गर्भपात हो जाता है, अथवा संतान पैदा होते ही खत्म हो जाती है। मेडिकल सांइस में भी गर्भाधारण के लिये ऋतु चक्र से सोलह दिन बताये गये है । यदि भूतकाल में देखे तो हमारे राजाओं , महाराजाओं के एक या दो ही संताने हुआ करती थी जो की जीवन के हर क्षेत्र में पूर्ण निपुण हुआ करती थी , क्योंकि हमारे विद्वानों ने गर्भाधारण के लिए औरत की जन्म कुंडली के अनुसार गर्भाधारण के लिए एक उचित समय का निर्धारण कर योग्य सन्तान प्राप्ति के बारे में आंकलन किया जाता है । आज के युग में भी यदि इस पर विचार करके गर्भ धारण किया जाये तो योग्य सन्तान प्राप्त की जा सकती है जिससे देश व राष्ट्र की उन्नति हो।
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प्रश्‍न : पुत्र प्राप्ति हेतु किस समय संभोग करें ?
उत्तर : इस विषय में आयुर्वेद में लिखा है कि
गर्भाधान ऋतुकाल की आठवीं, दसवी और बारहवीं रात्रि को ही किया जाना चाहिए। जिस दिन मासिक ऋतुस्राव शुरू हो उस दिन व रात को प्रथम मानकर गिनती करना चाहिए। छठी, आठवीं आदि सम रात्रियाँ पुत्र उत्पत्ति के लिए और सातवीं, नौवीं आदि विषम रात्रियाँ पुत्री की उत्पत्ति के लिए होती हैं। इस संबंध में ध्यान रखें कि इन रात्रियों के समय शुक्ल पक्ष यानी चांदनी रात वाला पखवाड़ा भी हो, यह अनिवार्य है, यानी कृष्ण पक्ष की रातें हों। इस संबंध में अधिक जानकारी हेतु इसी इसी चैनल के होमपेज पर ‘गर्भस्थ शिशु की जानकारी’ पर क्लिक करें।
प्रश्न : सहवास से विवृत्त होते ही पत्नी को तुरंत उठ जाना चाहिए या नहीं? इस विषय में आवश्यक जानकारी दें ?
उत्तर : सहवास से निवृत्त होते ही पत्नी को दाहिनी करवट से 10-15 मिनट लेटे रहना चाहिए, एमदम से नहीं उठना चाहिए। पर्याप्त विश्राम कर शरीर की उष्णता सामान्य होने के बाद कुनकुने गर्म पानी से अंगों को शुद्ध कर लें या चाहें तो स्नान भी कर सकते हैं, इसके बाद पति-पत्नी को कुनकुना मीठा दूध पीना चाहिए।
प्रश्न : मेधावी पुत्र प्राप्त करने के लिए क्या करना चाहिए ?
उत्तर : इसका उत्तर देना मुश्किल है,
प्रश्न : संतान में सदृश्यता होने का क्या कारण होता है ?
उत्तर : संतान की रूप रेखा परिवार के किसी सदस्य से मिलती-जुलती होती है,
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पुत्र प्राप्ति के लिए संतान गणपति स्तोत्र—–
विस्तार :-
पुत्र प्राप्ति के लिए संतान गणपति स्तोत्र
नमो स्तु गणनाथाय सिद्धिबुद्धियुताय च ।
सर्वप्रदाय देवाय पुत्रवृद्धिप्रदाय च ।।
गुरूदराय गुरवे गोप्त्रे गुह्यासिताय ते ।
गोप्याय गोपिताशेषभुवना चिदात्मने ।।
विŸवमूलाय भव्याय विŸवसृष्टिकराय ते ।
नमो नमस्ते सत्याय सत्यपूर्णाय शुण्डिने ।।
एकदन्ताय शुद्धाय सुमुखाय नमो नम: ।
प्रपन्नजनपालाय प्रणतार्तिविनाशिने ।।
शरणं भव देवेश संतति सुदृढां कुरू ।
भवष्यन्ति च ये पुत्रा मत्कुले गणनायक ।।
ते सर्वे तव पूजार्थे निरता: स्युर्वरो मत: ।
पुत्रप्रदमिदं स्तोत्रं सर्वसिद्धप्रदायकम् ।।
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मध्य प्रदेश की व्यापारिक नगरी इंदौर में एक ऐसा यशोदा मंदिर है जहां महिलाएं जन्माष्टमी के मौके पर यशोदा की गोद भरकर संतान की प्राप्ति की कामना करती हैं। इस मंदिर में भजन-पूजन के बीच गोद भराई का दौर शुरू हो गया है।
महाराजबाड़े के करीब स्थित यशोदा मंदिर में स्थापित मूर्ति में माता यशोदा कृष्ण जी को गोद में लिए हुई हैं। यह मूर्ति लगभग 200 साल पहले राजस्थान से इंदौर लाई गई थी। तभी से लोगों की मान्यता है कि जन्माष्टमी के मौके पर यशोदा जी की गोद भरने से मनचाही संतान की प्राप्ति होती है।
जो महिलाएं यशोदा जी की गोद भरती हैं, उनकी मनोकामना पूरी होती है। पुत्र प्राप्ति के लिए गेहूं के साथ नारियल और पुत्री की प्राप्ति के लिए चावल के साथ नारियल एवं सुहाग के सामान से यशोदा जी की गोद भरी जाती है। यह परंपरा वर्षो से चली आ रही है।
कृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर महिलाएं संतान प्राप्ति की कामना के साथ यशोदा जी की गोद भरती हैं। बुधवार से यहां गोद भराई का सिलसिला शुरू हो गया है।
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सन्तान प्रप्ति हमारे पूर्व जन्मोंपार्जित कर्मो पर है आधारित—
विवाह के उपरान्त प्रत्येक माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे को जल्द से जल्द सन्तान हो जाये और वे दादा-दादी, नाना-नानी बन जाये। मगर ऐसा सभी दम्पत्तियों के साथ नहीं हो पाता है। शादी के बाद 2-3 वर्ष तक सन्तान न होने पर यह एक चिन्ता का विषय बन जाता है। भारतीय सनातन परंपरा में सन्तान होना सौभाग्यशाली होने का सूचक माना जाता है। दाम्पत्य जीवन भी तभी खुशहाल रह पाता है जब दम्पत्ति के सन्तान हो अन्यथा समाज भी हेय दृष्टि से देखता है। पुत्र सन्तान का तो हमारे समाज में विशेष महत्व माना गया है क्योंकि वह वंश वृद्धि करता है।
सन्तान प्राप्ति हमारे पूर्व जन्मोपार्जित कर्मों पर आधारित है। अत: हमें नि:सन्तान दम्पत्ति की कुण्डली का अध्ययन करते वक्त किसी एक की कुण्डली का अध्ययन करने की बजाये पति-पित्न दोंनो की कुण्डली का गहन अध्ययन करने के बाद ही निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिये। अगर पंचमेश खराब है या पितृदोष, नागदोष व नाड़ीदोष है तब उनका उपाय मन्त्र, यज्ञ, अनुष्ठान तथा दान-पुण्य से करना चाहिये। प्रस्तुत लेख में सन्तान प्राप्ति में होने वाली रूकावट के कारण व निवारण पर प्रकाश डाला गया है। सन्तान प्राप्ति योग के लिये जन्मकुण्डली का प्रथम स्थान व पंचमेश महत्वपूर्ण होता है। अगर पंचमेश बलवान हो व उसकी लग्न पर दृष्टि हो या लग्नेश के साथ युति हो तो निश्चित तौर पर दाम्पत्ति को सन्तान सुख प्राप्त होगा।
यदि सन्तान के कारक गुरू ग्रह पंचम स्थान में उपनी स्वराशि धनु, मीन या उच्च राशि कर्क या नीच राशि मकर में हो तब कन्याओं का जन्म ज्यादा देखा गया है। पुत्र सन्तान हो भी जाती है तो बीमार रहती है अथवा पुत्र शोक होता है। यदि पंचम स्थान में मेष, सिंह, वृश्चिक या मीन राशि पर गुरू की दृष्टि या मंगल का प्रभाव होने पर पुत्र प्राप्ति होती है। यदि पंचम स्थान के दोनों ओर शुभ ग्रह हो व पंचम भाव तथा पंचमेश पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो पुत्र के होने की संभावना ज्यादा होती है। पंचमेश के बलवान होने पर पुत्र लाभ होता है। परन्तु पंचमेश अष्टम या षष्ठ भाव में नहीं होना चाहियें। बलवान पंचम, सप्तम या लग्न में स्थित होने पर उत्तम सन्तान सुख प्राप्त होता है।
बलवान गुरू व सूर्य भी पुत्र सन्तान योग का निर्माण करते हैं। पंचमेश के बलवान हाने पर, शुभ ग्रहों के द्वारा दृष्ट होने पर, शुभ ग्रहों से युत हाने पर पुत्र सन्तान योग बनता है। पंचम स्थान पर चन्द्र ग्रह हो व शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तब भी पुत्र सन्तान योग होता है। पुरूष जातक की कुण्डली में सूर्य व शुक्र बलवान हाने पर वह सन्तान उत्पन्न करने के अधिक योग्य होता है। मंगल व चन्द्रमा के बलवान हाने पर स्त्री जातक सन्तान उत्पन्न करने के योग्य होती है।
सन्तान न होने के योग –
पंचम स्थान या पंचमेश के साथ राहू होने पर सर्पशाप होता है। ऐसे में जातक को पुत्र नहीं होता है अथवा पुत्र नाश होता है। 
शुभ ग्रहों की दृष्टि हाने पर पुत्र प्राप्ति हो सकती है। 
यदि लग्न व त्रिकोण स्थान में शनि हो और शुभ ग्रहो द्वारा दृष्ट न हो तो पितृशाप से पुत्र प्राप्ति में कठिनाई होती है। 
पंचमेश मंगल से दृष्ट हो या पंचम भाव में कर्क राशि का मंगल हो तब पुत्र प्राप्ति में कठिनाई होती है तथा शत्रु के प्रभाव से पुत्र नाश भी होता है। 
पंचमेश व पंचम स्थान पर क्रूर ग्रहों की दृष्टि हो तब देवशाप द्वारा पुत्र नाश होता है। 
चतुर्थ स्थान में पाप ग्रह हो पंचमेश के साथ शनि हो एवं व्यय स्थान में पाप ग्रह हो तो मातृदोष कें कारण सन्तान प्राप्ति में कठिनाई होती है। 
भाग्य भाव में पाप ग्रह हो व पंचमेश के साथ शनि हो तब पितृदोष से सन्तान होने में कठनाई होती है। 
गुरू पंचमेश व लग्नेश निर्बल हो तथा सूर्य, चन्द्रमा व नावमांश निर्बल हो तब देवशाप के प्रभाव से सन्तान हानि होती है। 
गुरू, शुक्र पाप युक्त हों तो ब्राह्मणशाप व सूर्य, चन्द्र के खराब या नीच के होने पर पितृशाप के कारण सन्तान प्राप्ति में कठिनाई होती है। 
यदि लग्नेश, पंचमेश व गुरू निर्बल हों या 6वें,8वें,12वें स्थान में हो तों भी सन्तान प्राप्ति में कठिनाई होती है। पाप ग्रह चतुर्थ स्थान में हो तो भी सन्तान प्राप्ति की राह में कठिनाई होती है। 
नवम भाव में पाप ग्रह हो तथा सूर्य से युक्त हो तब पिता (जिसकी कुण्डली में यह योग हो उसके पिता) के जीवन काल में पोता देखना नसीब नहीं होता है।
सन्तान बाधा के उपाय——–
सूर्य व चन्द्रमा साथ-साथ होने पर सन्तान प्रप्ति के लिये पितृ व पितर का पूजन करना करना चाहियें।
चन्द्रमा के लिये गया (बिहार) क्षेत्र में श्राद्ध करना चाहियें व मन्दिरों में पूजा व जागरण का आयोजन करने से भी लाभ होता है।
मंगल के कारण सन्तान प्राप्ति में कठिनाई हो रही हो तो ब्राह्मणों को भोजन करायें तथा मां दुर्गा की आरधना करें। 
यदि बुध के कारण सन्तान प्राप्ति में बाधा आ रही हो तो भगवान विष्णु का पूजन करें तथा ब्राह्मणों को भोजन करयें। 
गुरू के कारण यदि सन्तान प्राप्ति में कठिनाई हो रही हो तो ब्राह्मणें की सेवा करें। गुरूवार को मिठाइयों से युक्त ब्राह्मणों को भोजन करायें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। पुत्रदायक औषधियां भी अच्छा कार्य करती हैं। शिवलिंगी के बीज तथा पुत्र जीवी के प्रयोग से भी लाभ मिलता है। 
शुक्र के कारण सन्तान प्राप्ति में कठिनाई हो तब शुक्रवार को सफेद वस्तुओं, सुगन्धित तेल आदि दान करे तथा यक्ष की पूजा करें। ब्राह्मणों को भोजन करने कर उनका आशिर्वाद प्राप्त करें।
शनि के कारण यदि सन्तान प्राप्ति में कठिनाई उत्पन्न हो रही हो तो सर्प की पूजा करें व सर्पों की दो मूर्तियों की पूजा करके दान में देनी चाहियें। सन्तान गोपाल यन्त्र के सामने पुत्र जीवी की माला के द्वारा सन्तान गोपाल मत्रं का जप करें।
यदि कोई दाम्पती प्रात: स्नानादि से निवत्तृ होकर भगवान श्री राम और माता कौशल्या की शोड्शोपचार पूजा करके नियमित रूप से एक माला इस चौपाई का पाठ करे तो पुत्र प्राप्ति अवश्य होगी:—-
प्रेम मगन कौशल्या, लिस दिन जात न जात। 
सुत सनेह बस माता, बाल चरित कर गाय।
सन्तान प्राप्ति हेतु यदि दाम्पति नौं वर्ष से कम आयु वाली कन्याओं के पैर छूकर 90 दिन तक यदि आशीर्वाद प्राप्त करे तो सन्तान अवश्य प्राप्त होगी।
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किसी को संतान होती ही नहीं है , कोई पुत्र चाहता है तो कोई कन्या …
हमारे ऋषि महर्षियों ने हजारो साल पहले ही संतान प्राप्ति के कुछ नियम और सयम बताये है ,संसार की उत्पत्ति पालन और विनाश का क्रम पृथ्वी पर हमेशा से चलता रहा है,और आगे चलता रहेगा। इस क्रम के अन्दर पहले जड चेतन का जन्म होता है,फ़िर उसका पालन होता है और समयानुसार उसका विनास होता है। मनुष्य जन्म के बाद उसके लिये चार पुरुषार्थ सामने आते है,पहले धर्म उसके बाद अर्थ फ़िर काम और अन्त में मोक्ष, धर्म का मतलब पूजा पाठ और अन्य धार्मिक क्रियाओं से पूरी तरह से नही पोतना चाहिये,धर्म का मतलब मर्यादा में चलने से होता है,माता को माता समझना पिता को पिता का आदर देना अन्य परिवार और समाज को यथा स्थिति आदर सत्कार और सबके प्रति आस्था रखना ही धर्म कहा गया है,अर्थ से अपने और परिवार के जीवन यापन और समाज में अपनी प्रतिष्ठा को कायम रखने का कारण माना जाता है,काम का मतलब अपने द्वारा आगे की संतति को पैदा करने के लिये स्त्री को पति और पुरुष को पत्नी की कामना करनी पडती है,पत्नी का कार्य धरती की तरह से है और पुरुष का कार्य हवा की तरह या आसमान की तरह से है,गर्भाधान भी स्त्री को ही करना पडता है,वह बात अलग है कि पादपों में अमर बेल या दूसरे हवा में पलने वाले पादपों की तरह से कोई पुरुष भी गर्भाधान करले।
धरती पर समय पर बीज का रोपड किया जाता है,तो बीज की उत्पत्ति और उगने वाले पेड का विकास सुचारु रूप से होता रहता है,और समय आने पर उच्चतम फ़लों की प्राप्ति होती है,अगर वर्षा ऋतु वाले बीज को ग्रीष्म ऋतु में रोपड कर दिया जावे तो वह अपनी प्रकृति के अनुसार उसी प्रकार के मौसम और रख रखाव की आवश्यकता को चाहेगा,और नही मिल पाया तो वह सूख कर खत्म हो जायेगा,इसी प्रकार से प्रकृति के अनुसार पुरुष और स्त्री को गर्भाधान का कारण समझ लेना चाहिये। जिनका पालन करने से आप तो संतानवान होंगे ही आप की संतान भी आगे कभी दुखों का सामना नहीं करेगा…
कुछ राते ये भी है जिसमे हमें सम्भोग करने से बचना चाहिए .. जैसे अष्टमी, एकादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा और अमवाश्या .चन्द्रावती ऋषि का कथन है कि लड़का-लड़की का जन्म गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष के दायां-बायां श्वास क्रिया, पिंगला-तूड़ा नाड़ी, सूर्यस्वर तथा चन्द्रस्वर की स्थिति पर निर्भर करता है।गर्भाधान के समय स्त्री का दाहिना श्वास चले तो पुत्री तथा बायां श्वास चले तो पुत्र होगा।
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गर्भ निरोध का उपाय——-
यदि पति-पत्नी दोनों सन्तान नहीं चाहते या कुछ काल तक ‘गर्भनिरोध’ चाहते हैं, तो रति-क्रिया में परस्पर मुख से मुख लगाकर इस मन्त्र का उच्चारण करें—-
‘इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आददे।’
इससे कभी गर्भ स्थापित नहीं होगा। रजस्वला स्त्री को तीन दिन तक कांसे के पात्र में खाने का भी निषेध है। अधिक शीत और उष्णता से भी बचना चाहिए। 
माता को अपनी सन्तान को स्तनपान कराने से भी नहीं बचना चाहिए। यह धर्म-विरुद्ध है और स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है।
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भारतीय संस्कृति में इस प्रजनन यज्ञ को सर्वाधिक श्रेष्ठ यज्ञ का स्थान प्राप्त है। यहाँ ‘काम’ का अमर्यादित आवेग नहीं है। ऐसी अमर्यादित रति-क्रिया करने से पुण्यों को क्षय होना माना गया है।
ऐसे लोग सुकृतहीन होकर परलोक से पतित हो जाते हैं। यशस्वी पुत्र-पुत्री के लिए प्रजनन यज्ञ-ऋतु धर्म के उपरान्त यशस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए रति-कर्म करने से पूर्व यह मन्त्र पढ़ें——–
‘इन्द्रियेण ते यशसा यश आदधामि।’
इस मन्त्र का आस्थापूर्वक मनन करने से निश्चय ही यशस्वी पुत्र की प्राप्ति होगी। यदि पुरुष गौरवर्ण पुत्र की इच्छा रखता हो, तो उसे ऋतु धर्म के उपरान्त सम्भोग तक अपनी पत्नी को घी मिलाकर दूध-चावल की खीर खिलानी चाहिए और स्वयं भी खानी चाहिए।
इससे पुत्र गौरवर्ण, विद्वान और दीर्घायु होगा।
इसके अलावा दही में चावल पकाकर खाने से व जल में चावल पकाकर व घी में मिलाकर खाने से भी पुत्र-रत्न की ही प्राप्ति होगी।
यदि पति-पत्नी विदुषी कन्या की कामना करते हों, तो तिल के चावल की खिचड़ी बनाकर खानी चाहिए।
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सन्तान प्राप्ति का अचूक टोटका/उपाय —–
1. सन्तान प्राप्ति के लिए भी पहले संकट बाँधने से लेकर संकट परिक्षण तक का सारा काम करना होता है।
2. सन्तान प्राप्ति की इच्छुक महिला (संकट-यात्रा के) आखिरी/समाप्ति वाली रात को एक थाली में मेंहदीं का थोडा गाढा घोल बना लें (इसे हाथों में लगा कर उल्टे थापे लगाने होते हैं)
3. रात को श्री बालाजी मन्दिर के कपाट बन्द होने के एक घण्टा बाद करीब नौ-दस बजे चुपचाप श्री बालाजी मन्दिर की मुख्य दिवारों पर मेंहदीं वाले घोल से अपने दोनों हाथों के उल्टे थापे लगा दे (काम पूरा करने के लिए कोई सहायक जरुर साथ ले लें परन्तु उससे बातचीत ना करें, उल्टे थापे लगाते समय मन ही मन में श्री बालाजी महाराज से नाराजगी रखते हुए कहें कि- जब तक आप मुझे पुत्र नहीं देगें तब तक मैं आप के यहाँ नहीं आऊगीं)
4. ठहरने के स्थान पर वापिस आकर थाली धो लें (काम पूरा हो गया है अब बातचीत कर सकते हो)
यह विश्वास है कि- रात को श्री बालाजी महाराज दौरे पर निकलते हैं व उल्टे थापों को देखकर नाराज़ गए लोगों की मनोकामना शीघ्र ही पूरी करते हैं।
नोट:- उल्टे थापे लगाने के बाद श्री बालाजी मेंहदींपुर तब तक नहीं जाना चाहिए जब तक मनोकामना पूरी ना हो जाए, अतः सोच-समझ कर पूरा विश्वास होने पर ही यह कार्य करें।
जब गर्भ-धारण का पता लगे तब श्री बालाजी मेंहदींपुर जाकर किसी दुकान से कच्चा सूत लेकर श्री बालाजी मन्दिर में से पढवा कर घर आकर गर्भवति महिला की कमर में बाँध दें इससे बच्चा हानि से मुक्त रहेगा लेकिन यह ध्यान रहे कि जब समय पूरा हो जाए व दर्द लगे हों तब सूत खोल दें नहीं तो बच्चे को जन्म देने में दिक्कत होगी। 
॥ जय श्री राम ॥
शुभम भवतु…कल्याण हो…!!!!!

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