सर्वश्रेष्ठ शुभ मुहूर्त यानी अक्षय तृतीया ..20 के बारे में जानकारी —
 
भारतीय पर्वों में अक्षय तृतीया पर्व का विशेष महत्व है। इस मुहूर्त को बेहद शुभ माना जाता है। किसी भी नए काम की शुरुआत से लेकर महत्वपूर्ण चीजों की खरीदारी व शादी विवाह जैसे काम भी इस दिन बिना किसी शंका के किए जाते हैं।
 
अक्षय तृतीया के पिछे बहुत सारी मान्यताएं, बहुत सारी कहानियां भी जुड़ी हैं। इसे भगवान परशुराम जयंती के जन्मदिन यानि परशुराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम के अलावा विष्णु के अवतार नर व नारायण के अवतरित होने की मान्यता भी इसी दिन से जुड़ी है। यह भी मान्यता है कि त्रेता युग का आरंभ इसी तिथि से हुआ था।
 
मान्यता के अनुसार इस तिथि को उपवास रखने, स्नान दान करने से अनंत फल की प्राप्ति होती है। यानि व्रती को कभी भी किसी चीज़ का अभाव नहीं होता, उसके भंडार हमेशा भरे रहते हैं। चूंकि इस व्रत का फल कभी कम न होने वाला, न घटने वाला, कभी नष्ट न होने वाला होता है इसलिये इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है।
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ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों की खरीददारी या घर, भूखंड, वाहन आदि की खरीददारी से संबंधित कार्य किए जा सकते हैं.नवीन वस्त्र, आभूषण आदि धारण करने और नई संस्था, समाज आदि की स्थापना या उदघाटन का कार्य श्रेष्ठ माना जाता है.
 
पुराणों में लिखा है कि इस दिन पितरों को किया गया तर्पण तथा पिन्डदान अथवा किसी और प्रकार का दान, अक्षय फल प्रदान करता है.इस दिन गंगा स्नान करने से तथा भगवत पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि इस दिन किया गया जप, तप, हवन, स्वाध्याय और दान भी अक्षय हो जाता है.
 
यह तिथि यदि सोमवार तथा रोहिणी नक्षत्र के दिन आए तो इस दिन किए गए दान, जप-तप का फल बहुत अधिक बढ़ जाता हैं. इसके अतिरिक्त यदि यह तृतीया मध्याह्न से पहले शुरू होकर प्रदोष काल तक रहे तो बहुत ही श्रेष्ठ मानी जाती है। यह भी माना जाता है कि आज के दिन मनुष्य अपने या स्वजनों द्वारा किए गए जाने-अनजाने अपराधों की सच्चे मन से ईश्वर से क्षमा प्रार्थना करे तो भगवान उसके अपराधों को क्षमा कर देते हैं और उसे सदगुण प्रदान करते हैं, अतः आज के दिन अपने दुर्गुणों को भगवान के चरणों में सदा के लिए अर्पित कर उनसे सदगुणों का वरदान माँगने की परंपरा भी है
 
अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर समुद्र या गंगा स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की शांत चित्त होकर विधि विधान से पूजा करने का प्रावधान है। नैवेद्य में जौ या गेहूँ का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पित किया जाता है. तत्पश्चात फल, फूल, बरतन, तथा वस्त्र आदि दान करके ब्राह्मणों को दक्षिणा दी जाती है. चार ब्राह्मण को भोजन करवाना कल्याणकारी समझा जाता है. मान्यता है कि इस दिन सत्तू अवश्य खाना चाहिए तथा नए वस्त्र और आभूषण पहनने चाहिए.गौ, भूमि, स्वर्ण पात्र इत्यादि का दान भी इस दिन किया जाता है.
 
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अक्षय तृतीया 2020 हेतु यह रहेगा शुभ मुहूर्त —
 
अक्षय तृतीया पूजा मुहूर्त – सुबह 5 बजकर 45 मिनट से दोपहर .2 बजकर 19 मिनट तक (26 अप्रैल 2020)
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अक्षय तृतीया पर सोना खरीदने का समय – रात 11 बजकर 51 मिनट (25 अप्रैल 2020) से सुबह 05 बजकर 45 मिनट तक (26 अप्रैल 2020)
 
अक्षय तृतीया पर सोना खरीदने का समय – सुबह 5 बजकर 45 मिनट से दोपहर 1 बजकर 22 मिनट तक (26 अप्रैल 2020)
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अक्षय तृतीया 2020 पर यह रहेगा शुभ चौघड़िया मुहूर्त–
 
प्रातः मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत) – सुबह 7 बजकर 2. मिनट से दोपहर 12 बजकर 19 मिनट तक
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अपराह्न मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत) – दोपहर 12 बजकर 19 मिनट से शाम 5 बजकर 14 मिनट तक
 
सायाह्न मुहूर्त (लाभ) – शाम 6 बजकर 53 मिनट से रात 8 बजकर 14 मिनट तक
 
रात्रि मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर) – रात 9 बजकर 36 मिनट से रात 1 बजकर 40 मिनट तक
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उषाकाल मुहूर्त (लाभ) – सुबह 4 बजकर 23 मिनट से सुबह 5बजकर 45 मिनट तक
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तृतीया तिथि प्रारम्भ – सुबह 11 बजकर 51 मिनट बजे से (25 अप्रैल 2020)
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अक्षय तृतीया तिथि समाप्त – अगले दिन दोपहर 01 बजकर 22 मिनट तक (26 अप्रैल 2020)
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यह तिथि वसंत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ का दिन भी है इसलिए अक्षय तृतीया के दिन जल से भरे घडे, कुल्हड, सकोरे, पंखे, खडाऊँ, छाता, चावल, नमक, घी, खरबूजा, ककड़ी, चीनी, साग, इमली, सत्तू आदि गरमी में लाभकारी वस्तुओं का दान पुण्यकारी माना गया है.
 
इस दान के पीछे यह लोक विश्वास है कि इस दिन जिन-जिन वस्तुओं का दान किया जाएगा, वे समस्त वस्तुएँ स्वर्ग या अगले जन्म में प्राप्त होगी. इस दिन लक्ष्मी नारायण की पूजा सफेद कमल अथवा सफेद गुलाब या पीले गुलाब से करना चाहिये
 
अर्थात सभी महीनों की तृतीया में सफेद पुष्प से किया गया पूजन प्रशंसनीय माना गया है.
 
ऐसी भी मान्यता है कि अक्षय तृतीया पर अपने अच्छे आचरण और सद्गुणों से दूसरों का आशीर्वाद लेना अक्षय रहता है. भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायी मानी गई है। इस दिन किया गया आचरण और सत्कर्म अक्षय रहता है.
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अक्षय तृतीया सर्वसिद्ध अबूझ मुहूर्त तिथि—
 
मांगलिक कार्यों के लिये इस तिथि को बहुत ही शुभ माना जाता है। पण्डित दयानन्द शास्त्री की के अनुसार एक और जहां मांगलिक कार्यों को करने के लिये अक्षर शुभ घड़ी व शुभ मुहूर्त जानने के लिये पंडित जी से सलाह लेनी पड़ती है वहीं अक्षय तृतीया एक ऐसी सर्वसिद्धि देने वाली तिथि मानी जाती है जिसमें किसी भी मुहूर्त को दिखाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस तिथि को अबूझ मुहूर्तों में शामिल किया जाता है। इस दिन सोना खरीदने की परंपरा भी है। मान्यता है कि ऐसा करने से समृद्धि आती है। मान्यता यह भी है कि अपनी नेक कमाई में से कुछ न कुछ दान इस दिन जरुर करना चाहिये।
 
अक्षय तृतीया का पर्व हर साल वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान नर-नारायण सहित परशुराम और हय ग्रीव का अवतार हुआ था। इसके अलावा, ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का जन्म भी इसी दिन हुआ था।
 
इस दिन बद्रीनाथ की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है और लक्ष्मी नारायण के दर्शन किए जाते हैं. प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही पुनः खुलते हैं. वृंदावन स्थित बांके बिहारी जी मन्दिर में भी केवल इसी दिन विग्रह के चरण दर्शन होते हैं, अन्यथा वे पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते हैं.इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था.ऐसी मान्यता है कि इस दिन से प्रारम्भ किए गए कार्य अथवा इस दिन को किए गए दान का कभी भी क्षय नहीं होता.
 
स्कंद पुराण और भविष्य पुराण में उल्लेख है कि वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को रेणुका के गर्भ से भगवान विष्णु ने परशुराम रूप में जन्म लिया.
 
पण्डित दयानन्द जी के अनुसार अक्षय एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है “धन, की कमी नहीं होना” और तृतीया का अर्थ है “तीसरा” जो की हिंदी पंचांग की तिथि होती।
 
आमतौर पर, यह अक्षय तृतीया का त्यौहार हिंदू कैलेंडर के पहले महीने वैशाख या चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष में आता है । अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, यह तिथियां हर साल अप्रैल या मई के महीने में आती हैं। हिंदू और जैन धर्म के लोगों के लिए यह बहुत विशेष महत्व रखता है क्योंकि इस समुदाय के लिये यह अवसर सबसे महत्वपूर्ण तिथियों में से एक माना है।
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पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है, सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ है। भगवान विष्णु ने नर-नारायण, हयग्रीव और परशुराम का अवतरण भी इसी तिथि को हुआ था. ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का आविर्भाव भी इसी दिन हुआ था.
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अक्षय तृतीया के दिन पंखा, चावल, नमक, घी, चीनी, सब्जी, फल, इमली और वस्त्र वगैरह का दान अच्छा माना जाता है। यह व्रत गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश सहित पूरे उत्तर भारत में मनाया जाता है। बद्रीनारायण के कपाट भी इसी दिन खुलते हैं।
 
 
 प्रचलित पौराणिक कथानक के अनुसार अक्षय तृतीया के दान ने उसे इस प्रकार महान बना दिया कि ब्रह्म, विष्णु, महेश तक उसके द्वार में अक्षय तृतीया के दिन ब्राह्मण का वेष धारण करके उसके विशाल यज्ञ में भाग लेते थे। कहते कि उसे न धन का और नहीं राजा होने का घमंण्ड कभी नहीं हुआ। इसी राजा को कुछ लोग चंद्रगुप्त के रूप मे अगले जन्म उत्पन्न होने की बात को स्वीकारते हैं। जैन धर्म के लिए भी अक्षय तृतीया का बहुत ही महत्व है। क्योंकि इसी तिथि में श्री ऋषभदेव भगवान ने एक वर्ष की तपस्या करने के पश्चात् गन्ने के रस जिसे इक्षु रस भी कहा जाता है। ऋषभ देव ने मानव कल्याण के लिए सत्य अहिंसा का प्रचार किया था। अक्षय तृतीय के अवसर पर देश के विभिन्न भागों में जैसे- उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि सहित अनेक स्थानों में इसे दिन सगुन बाँटने का रिवाज है। 
 
पौराणिक कहानियों के मुताबिक, इसी दिन महाभारत की लड़ाई खत्म हुई। द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ। इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर के पूछने पर यह बताया था कि आज के दिन जो भी रचनात्मक या सांसारिक कार्य करोगे, उसका पुण्य मिलेगा। कोई भी नया काम, नया घर और नया कारोबार शुरू करने से उसमें बरकत और ख्याति मिलेगी। अक्षय तृतीया के दिन स्नान, ध्यान, जप तप करना, हवन करना, स्वाध्याय पितृ तर्पण करना और दान पुण्य करने से पुण्य मिलता है ।
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पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक गरीब सदाचारी और देवताओं में श्रद्धा रखने वाला वैश्य रहता था। अमीर बिरादरी से आने पर भी वह बहुत गरीब था और दिन-रात परेशान रहता था। एक दिन किसी ब्राह्माण ने उसे अक्षय तृतीया का व्रत रखने की सलाह दी। त्योहार के दिन गंगा स्नान करके विधि-विधान से देवताओं की पूजा करने को भी उन्होंने पुण्य बताया।
 
वैश्य ने ऐसा ही किया और कुछ ही दिनों के बाद उसका व्यापार फलने-फूलने लगा। उसके बाद उसने जीवनभर अक्षय तृतीया के दिन खुलकर दान पुण्य किया। अगले जन्म में वह कुशावती का राजा बना। वह इतना धनी और प्रतापी राजा था कि भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश तक उसके दरबार में अक्षय तृतीया के दिन ब्राह्माण का वेष धारण करके उसके महायज्ञ में शामिल होते थे। अपनी श्रद्धा और भक्ति का उसे कभी घमंड नहीं हुआ और महान वैभवशाली होने के बावजूद भी वह धर्म मार्ग से विचलित नहीं हुआ। यही राजा आगे चलकर राजा चंद्रगुप्त के रूप में पैदा हुआ।
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इस शुभ मुहूर्त में करने योग्य उपय/टोटके —
 
अक्षय तृतीया के दिन ऐसे विवाह भी मान्य होते हैं, जिनका मुहूर्त साल भर नहीं निकल पाता है। दूसरे शब्दों में ग्रहों की दशा के चलते अगर किसी व्यक्ति के विवाह का दिन नहीं निकल पा रहा है, तो अक्षय तृतीया के दिन बिना लग्न व मुहूर्त के विवाह होने से उसका दांपत्य जीवन सफल हो जाता है। यही कारण है कि राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, बंगाल आदि में आज भी अक्षय तृतीया के दिन हजारों की संख्या में विवाह होते हैं।
 
 जिनके अटके हुए काम नहीं बन पाते हैं, व्रत उपवास करने के बावजूद जिनकी मनोकामना की पूर्ति नहीं हो पा रही हो और जिनके व्यापार में लगातार घाटा चल रहा हो, उनके लिए कोई भी नई शुरुआत करने के लिए अक्षय तृतीया का दिन बेहद शुभ माना जाता है।
 
इसके अलावा, कमाई के बावजूद जिनके घर में पैसा न टिकता हो, जिनके घर में सुख शांति न हो, संतान मनोनुकूल न हो, शत्रु चारों तरफ से हावी हो रहे हों, तो ऐसे में अक्षय तृतीया का व्रत रखना और दान पुण्य करना बेहद फलदायक होता है। हां कुछ लोग कोई नई चीज जैसे आभूषण, वस्त्र, गाड़ी, जायदाद आदि चीजों को इस दिन खरीदना शुभ मानते हैं।
 
अक्षय तृतीया के दिन हर प्रकार के शुभ काम होने शुरू हो जाते हैं और इस माता लक्ष्मी को खुश करने का भी खास दिन होता हैं | इस वर्ष 2020 में कई वर्षों बाद शनिवार को अक्षय तृतीया’ का सयोंग बना हैं जिसमे हर व्यक्ति के कर्मो के अनुसार माता उसको फल देगी | इसलिए यह दिन बहुत ही विशेष महत्व का हैं |
 
अक्षय तृतीया के बारे में कई कथाएं व्रत व पौराणिक व धार्मिक ग्रंथों में उपलब्ध है। जिसमें धर्मदास नाम के वैश्य की कथा है। जो कि सद्गुणी, ईश्वर भक्त, दानी तथा धार्मिक था। देवता, ब्राह्मण के प्रति उसकी अटूट श्रद्धा थी। किन्तु बढ़ती हुई उम्र के कारण उसे कई तरह की शारीरिक पीड़ाएं व बीमारियों से परेशानी होने के बाद भी उसके श्रद्धा व विश्वास में कमी नहीं हुई और वह अक्षय तृतीया के व्रत, दान में कठिन दिनों में तत्पर रहा। इस तरह से उसके जीवन में कठिनता की स्थिति बनी हुई थी किन्तु वह अक्षय तृतीया के व्रत में उसी श्रद्धा विश्वास से तत्पर रहते हुए तीर्थ स्थान व ब्राह्मणों को नाना प्रकार के दिव्य वस्त्र, सोने का दान दिया। परिणामतः इस व्रत के दान के प्रभाव से दूसरे जन्म में कुशावती का अत्यंत प्रतापी राजा बना। 
 
कई स्थानों में प्रथाओं के अनुसार प्रचलित गीतों को गाया जाता है। खेती के कामों में लगे किसानों के लिए यह दिन शुभ सूचक होता है। कई किसान व जातियों के लोग आगामी वर्ष फसलों की स्थिति सहित अनेक शुभाशुभ सूचकों को पूर्वानुमान अपने प्रचलित नियमों के अनुसार लगाते हैं। कि इस वर्ष का समय किस प्रकार होगा। वर्षा की स्थिति क्या होगी। तथा उपज किस प्रकार की होगी आदि तथ्यों को खोजते हैं।
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> अक्षय तृतीया या आखा तीज वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहते हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है।इसी कारण इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है।
> भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि को  सतयुग और त्रेता युग का प्रारम्भ हुआ है।
> भगवान विष्णु के अवतार भगवान परशुराम जी का अवतरण भी इसी तिथि को हुआ था।
> ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का आविर्भाव भी इसी दिन हुआ था।
> प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही पुनः खुलते हैं। *वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी जी मन्दिर में भी केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं, अन्यथा वे पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते हैं।
>  इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था।
> इस दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव भगवान ने एक वर्ष की पूर्ण तपस्या करने के पश्चात इक्षु (शोरडी-गन्ने) रस से पारायण किया था । इसी कारण इस तिथि को इक्षु तृतीया भी कहते हैं ।
> कृषक समुदाय में इस दिन एकत्रित होकर आने वाले वर्ष के आगमन, कृषि पैदावार आदि के शगुन देखते हैं।
 
> आज  ही के दिन माँ गंगा का अवतरण धरती पर हुआ था ।
 
> महर्षी परशुराम का जन्म आज ही के दिन हुआ था ।
 
> माँ अन्नपूर्णा का जन्म भी आज ही के दिन हुआ था
 
> द्रोपदी को चीरहरण से कृष्ण ने आज ही के दिन बचाया था ।
 
> कृष्ण और सुदामा का मिलन आज ही के दिन हुआ था ।
 
> कुबेर को आज ही के दिन खजाना मिला था ।
 
> सतयुग और त्रेता युग का प्रारम्भ आज ही के दिन हुआ था ।
 
> ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण भी आज ही के दिन हुआ था ।
 
> प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री बद्री नारायण जी का कपाट आज ही के दिन खोला जाता है ।
> बृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर में साल में केवल आज ही के दिन श्री विग्रह चरण के दर्शन होते है अन्यथा साल भर वो वस्त्र से ढके रहते है ।
> इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था ।
> अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयं सिद्ध मुहूर्त है कोई भी शुभ कार्य का प्रारम्भ किया जा सकता है ।।

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