मंगल हमेशा अमंगल नहीं करता….

मंगल एक पापी एंव क्रुर ग्रह हे इसे भुमि पुत्र कुज आदी नामों से भी पुकारा जाता हे। कुज का अर्थ होता हे कु अर्थात खराब या पापी ओर ‘ज’ अर्थात जन्मा हुआ अर्थात पाप से जन्मा हुआ जब यह ग्रह लग्न से प्रथम चर्तुथ सप्तम अष्टम या द्वादश भाव में बैठता है तब अपना शुभाशुभ प्रभाव दिखाता है इस स्थिति को मंगल दोष कहा जाता है।
लग्न में मंगल स्थित होने से या उस पर मंगल की दृष्टि पड़ने से जातक का स्वास्थ्य प्रभावित होता है और वह स्वभाव से जिद्दी एवं उग्र हो जाता है चतुर्थ भाव के मंगल से प्रभावित होने पर दैनिक वस्तुओं की कमी तथा सांसारिक एवं मातृ सुख का अभाव रहता है। सप्तम भाव मंे मंगल स्थित होने या उस पर दृष्टि पड़ने से दाम्पत्य जीवन दुखमय होता है। और व्यवसाय एवं साझेदारी में समस्या उत्पन्न होती है। अष्टम स्थान में मंगल का प्रभाव होने से जीवन में अनेक बाधाएं; अनिष्ट दुर्धटना आदि होती रहती है। मंगल क बारहवें धर में स्थिता होने या उस पर दृष्टि पड़ने से अधीक व्यय होता है और मन में चिंता एवं परेशानियां बनी रहती है। 
लेकिन दक्षीण भारत के कुछ विद्वानो के मतानुसार द्वितीय धर मे भी मंगल रहने से मंगल दोष होता है। क्योंकी द्वितीय पर पती या पत्नी का अष्टम अर्थात दोनो की आयु का धर होता हे इस भाव से परिवार सुख का विचार किया जाता है। कुछ विद्वानो के मतानुसार चंद्र राशी एंव शुक्र राशी से भी इन पांच भावो में मंगल रहने से मंगल दोष माना जाता हे क्योंकि चंद्रमा मनसो जातः । यजुर्वेद के अनुसार चंद्रमा मन का कारक ग्रह हे तथा शुक्र रति का प्रतिनिधित्व करता है। इसके अतिरिक्त मंल दाम्पत्य धैर्य साहस उर्जा एवं उत्तेजना का प्रतिनिधित्व करता है।
श्री मंत्रेश्वरकृत फलदीपीका मे भी चत्द्र और शुक्र से सप्तमस्थ मंगल दोष के कुछ फल बताए गए है।
(.) जातक वर या कन्या की विवाह देर से होना।
(.) जातक की आयु कम होना।
(.) पति-पत्नि दोनो का आपस में तकरार होना।
(4) दोनो का आपस में मत भेद होना।
(5) दोनों में सबंध विच्छेद होना।
(6) नोकरी या व्यवसाय के चलते एक दुसरे से दुर रहना।
लेकिन मंगल दोष हमेशा अनिष्टकारक नहिं होता है। कुछ परिस्थितियों में मंगल लायक जोष वीर्य एंव कामशक्तिवर्द्धक है। और उत्साही तेज मय उर्जावान पराक्रमी साहसीक एंव शक्तीशाली आदि बनाता है। मंगल दोष से युक्त जातक का कुछ परिस्थतियो मे बहुत अच्छा दाम्पत्य सुख सर्वागिण विकास एंव संतोश जनक जिवन देखा गया है। इस दोष से प्रभावित जातक ही सफल उच्चाधिकारी सेनाधिकारी व्यवसायी डाक्टर अभियंता वकिल आदि पाए गए है। जो दाम्पत्य सुख संपन्न हो तथा जिवन में हर द्रष्टिकोण संतुष्ट हे स्त्रि के विधवा या पुरुष के विधुर होने का कारण मंगल दोष नहिं है। 

मंगल शान्ति के कुछ उपाय

(1) मंगल ग्रह कि शान्ति के लिए शिव उपासना तथा प्रवाल रत्न (मुंगा) धारण करें।
(2) हनुमान जी तथा प्रवाल रत्न (मंुगा) धारण करें।
(3) मं्रगलवार एंव शनिवार को हनुमान जी को सींदुर का चोला पहनाए 
(4) तांबा; सोना; गेंहु; लाल वस्त्र; गुड़; लाल चंदन; लाल पुष्प; केसर; मसुर की दाल; तथा भुमी दान करे ।
(5) मंगल वार का व्रत करे तथा लोगों में मिठाई बांटे।
(6) मंगल के वैदिक पौराणीक बीज या सामान्य मंत्र का निश्चित संख्या मंे जप दशांश हवन उसके दशांश तर्पण उसके दशांश मार्जन करें। और उसके दशांश बा्रहम्ण भोज  कराएं।
1 वेदिक मंत्रः- ¬ अग्नि मुर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम् अपा रेता सि जिन्वती।
2 पौराणीक मंत्राः- धरणी गर्भ संभुतं विद्युत कान्ती संप्रभम्। कुमारं शक्तिहस्तमं मंगलं प्रण माम्यहम्।
3 बीजमत्रांः ¬ का्रं क्रीं कौं सः भोमाय नमः।
4 सामान्य मंत्राः- ¬ अं अंगारकाय नमः।
इन सब के लिए किसी योग्य कर्मकांडी पंडित कि सहायता ली सकती है।
(7) गायत्राी मंत्रा का उपांशु जप करें।
(8) लाल रुमाल पास रखें ।
(9) इटालियन मुंगा अनामिका अंगुली में धारण करें।
(1.) धर्मस्थान में मिष्ठान वितरण करें।
(11) तांबे का सिक्का बहते हुए जल में प्रवाहित करंे।
(12) तंदुर कि तीठी रोटी कुत्ते को खिलाएं।
(13) धर और दफ्तर में नोकर रखें।
(14) चांदी की डिब्बी में शहद भरकर जल मंे प्रवाहीत करें।
(15) बंदरो केले खिलाएं।
(16) हनुमान जी मंदिर में जाकर बूंदि का लड्डू चढ़ाएं और बांटे।
(17) तेज प्रवाह वाले जल में 100 गा्रम चीनी प्रवाहीत करें।
(18) ढाक के 101 पत्ते जल में प्रवाहित करें।
(19) चांदी की चूड़ी में लाल रंग लगाकर पत्नी को धारण कराएं।

  पं0 दयानन्द शास्त्री 
विनायक वास्तु एस्ट्रो शोध संस्थान ,  
पुराने पावर हाऊस के पास, कसेरा बाजार, 
झालरापाटन सिटी (राजस्थान) 326023
मो0 नं0…..

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