गुरु पूर्णिमा …6 


प्रिय पाठकों/मित्रों, आप सभी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनायें |





हम चाहे बात कितनी भी बड़ी बड़ी कर ले,लेकिन सच्चाई तो हम सभी जानते हैं, हमारा जीवन-मार्ग का रास्ता स्वयं ही सदगुरुदेव बनाते जाते हैं | वे पहले भी अंगुली पकडे थे अब भी हैं और कल भी रहेंगे, अंतर केवल इतना है क़ि जिसकी देखने की आँखे हैं वो देख लेता है और जिनकी नहीं हैं वे अब भी कुतर्कों के भंवर में उलझे हुए हैं……


हे गुरुदेव ! गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व पर आपके श्रीचरणों में अनंत कोटि प्रणाम ||


आप जिस पद में विश्रांति पा रहे हैं, हम भी उसी पद में विशांति पाने के काबिल हो जायें,अब आत्मा-परमात्मा से जुदाई की घड़ियाँ ज्यादा न रहें और ईश्वर करे कि ईश्वर में हमारी भक्ति समाहित हो जाये ||


हे गुरुदेव !आपके साथ मेरी श्रद्धा की डोर कभी टूटने न पाये ||


प्रभु करे कि प्रभु के नाते आपके साथ हमारा हमेशा गुरु-शिष्य का सम्बंध बना रहे ||


‘जय हिंद,जय हिंदी’जय भारत..जय भारती..


सम्पूर्ण भारत में गुरु पूर्णिमा पर्व आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को श्रद्धाभाव व उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। यह पर्व जीवन में गुरु की महत्ता व महर्षि वेद व्यास को समर्पित है। भारतवर्ष में कई विद्वान गुरु हुए हैं, किन्तु महर्षि वेद व्यास प्रथम विद्वान थे, जिन्होंने सनातन धर्म (हिन्दू धर्म) के चारों वेदों की व्याख्या की थी। सिख धर्म में भी गुरु को भगवान माना जाता इस कारण गुरु पूर्णिमा सिख धर्म का भी अहम त्यौहार बन चुका है।


“”ॐ जय जय मम् परमगुरुदेवम् चरण कमलेभ्यो शत कोटि नमनम् वन्दनम् । जय गुरुदेवम् ।””


गुरु के प्रति नतमस्तक होकर कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है गुरुपूर्णिमा| गुरु के लिए पूर्णिमा से बढ़कर और कोई तिथि नहीं हो सकती. जो स्वयं में पूर्ण है, वही तो पूर्णत्व की प्राप्ति दूसरों को करा सकता है. पूर्णिमा के चंद्रमा की भांति जिसके जीवन में केवल प्रकाश है, वही तो अपने शिष्यों के अंत:करण में ज्ञान रूपी चंद्र की किरणें बिखेर सकता है || इस दिन हमें अपने गुरुजनों के चरणों में अपनी समस्त श्रद्धा अर्पित कर अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए| यह पूर्णिमा व्यास पूर्णिमा भी कहलाती है || गुरु कृपा असंभव को संभव बनाती है. गुरु कृपा शिष्य के हृदय में अगाध ज्ञान का संचार करती है || हमारे अध्यात्म दर्शन में गुरु का बहुत महत्व है-इतना कि श्रीमद् भागवत् गीता में गुरुजनों की सेवा को धर्म का एक भाग माना गया है। शायद यही कारण है कि भारतीय जनमानस में गुरु भक्ति का भाव की इतने गहरे में पैठ है कि हर कोई अपने गुरु को भगवान के तुल्य मानता है। यह अलग बात है कि अनेक महान संत गुरु की पहचान बताकर चेताते हैं कि ढोंगियों और लालचियों को स्वीकार न करें तथा किसी को गुरु बनाने से पहले उसकी पहचान कर लेना चाहिए। 


आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है और इसी के संदर्भ में यह समय अधिक प्रभावी भी लगता है | इस वर्ष गुरू पूर्णिमा 19 जुलाई 2016 (मंगलवार) को मनाई जाएगी | गुरू पूर्णिमा अर्थात गुरू के ज्ञान एवं उनके स्नेह का स्वरुप है. हिंदु परंपरा में गुरू को ईश्वर से भी आगे का स्थान प्राप्त है तभी तो कहा गया है कि “हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर” ||


इस दिन के शुभ अवसर पर गुरु पूजा का विधान है | गुरु के सानिध्य में पहुंचकर साधक को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त होती है|


गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी होता है| वेद व्यास जी प्रकांड विद्वान थे उन्होंने वेदों की भी रचना की थी इस कारण उन्हें वेद व्यास के नाम से पुकारा जाने लगा |हिन्दु और बौद्ध धर्म में गुरु पुर्णिमा को बहुत अधिक महत्व दिया गया है।


इस वर्ष 19-07-2016 (मंगलवार)को गुरु पुर्णिमा के तौर पर मनाया जाएगा। गुरु को ईश्वर के बाद उच्च स्थान दिया गया है। 


इसलिए शास्त्रो में कहा गया है कि–


गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु र्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरु साक्षात परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥


इस मंत्र का मतलब है कि, हे गुरुदेव आप ब्रह्मा हैं, आप विष्णु हैं, आप ही शिव हैं। गुरु आप परमब्रह्म हो, हे गुरुदेव मैं आपको नमन करता हूँ। 


अषाड माह में शुक्लपक्ष की पूनम का दिन गुरु पुर्णिमा का दिन है। गुरु का अर्थ समझें तो गुरु शब्द में (गु) का मतलब है अंधेरा, अज्ञानता और (रु) का मतलब है दूर करना। यानि जो हमारी अज्ञानता दूर करता है एवं जीवन में निराशा एवं अंधकार को दूर करे, वह गुरुदेव हैं। 


हमारी संस्कृति एक अति महत्वपूर्ण पहलू गुरु-शिष्य परंपरा है। जिस समय बच्चों को पवित्र धागा पहना कर आश्रम भेजा जाता है, तब से ही उनकी जिंदगी बनाने का कार्य गुरु करते हैं। उसके लिए माता-पिता दोनो गुरु ही हैं, और जब वह अपना विद्याभ्यास खत्म करके जिंदगी की नयी शुरूआत करता है, तब आश्रम से अलविदा लेने से पहले शिष्य गुरु को अपनी शक्ति अनुसार गुरुदक्षिणा देते हैं। यह परंपरा जारी रख कर, हर साल गुरु पुर्णिमा के दिन गुरु का ऋण पूरा करने के लिए अपनी क्षमता के अनुसार हर व्यक्ति अपने गुरु को कुछ उपहार के तौर पर कुछ देता है, इसे गुरु-शिष्य परंपरा कहा जाता है। 


अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है। गुरु वह है जो अज्ञान का निराकरण करता है अथवा गुरु वह है जो धर्म का मार्ग दिखाता है। श्री सद्गुरु आत्म-ज्योति पर पड़े हुए विधान को हटा देता है।




‘सदगुरु जिसे मिल जाय सो ही धन्य है जन मन्य है।
सुरसिद्ध उसको पूजते ता सम न कोऊ अन्य है॥
अधिकारी हो गुरुदेव से उपदेश जो नर पाय है।
भोला तरे संसार से नहीं गर्भ में फिर आय है॥’




पण्डित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के अवतार वेद व्यासजी का जन्म हुआ था। इन्होंने महाभारत आदि कई महान ग्रंथों की रचना की। कौरव, पाण्डव आदि सभी इन्हें गुरु मानते थे इसलिए आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा व व्यास पूर्णिमा कहा जाता है। गुरु का दर्जा भगवान के बराबर माना जाता है क्योंकि गुरु, व्यक्ति और सर्वशक्तिमान के बीच एक कड़ी का काम करता है. संस्कृत के शब्द गु का अर्थ है अन्धकार, रु का अर्थ है उस अंधकार को मिटाने वाला ||


भारतीय अध्यात्म में गुरु का अत्ंयंत महत्व है। सच बात तो यह है कि आदमी कितने भी अध्यात्मिक ग्रंथ पढ़ ले जब तक उसे गुरु का सानिध्य या नाम के अभाव में  ज्ञान कभी नहीं मिलेगा वह कभी इस संसार का रहस्य समझ नहीं पायेगा। इसके लिये यह भी शर्त है कि गुरु को त्यागी और निष्कामी होना चाहिये।  दूसरी बात यह कि गुरु भले ही कोई आश्रम वगैरह न चलाता हो पर अगर उसके पास ज्ञान है तो वही अपने शिष्य की सहायता कर सकता है।  यह जरूरी नही है कि गुरु सन्यासी हो, अगर वह गृहस्थ भी हो तो उसमें अपने  त्याग का भाव होना चाहिये।  त्याग का अर्थ संसार का त्याग नहीं बल्कि अपने स्वाभाविक तथा नित्य कर्मों में लिप्त रहते हुए विषयों में आसक्ति रहित होने से है।


पण्डित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के अनुसार आत्मबल को जगाने का काम गुरु ही करता है. गुरु अपने आत्मबल द्वारा शिष्य में ऐसी प्रेरणाएं भरता है, जिससे कि वह अच्छे मार्ग पर चल सके. साधना मार्ग के अवरोधों एवं विघ्नों के निवारण में गुरु का असाधारण योगदान है. गुरु शिष्य को अंत: शक्ति से ही परिचित नहीं कराता, बल्कि उसे जागृत एवं विकसित करने के हर संभव उपाय भी बताता है ||पण्डित “विशाल” दयानन्द शास्त्री के अनुसार इस दिन गुरु की पूजा कर सम्मान करने की परंपरा प्रचलित है। हिंदू धर्म में गुरु को भगवान से भी श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि गुरु ही अपने शिष्यों को सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है तथा जीवन की कठिनाइयों का सामना करने के लिए तैयार करता है ||




संत कबीर ने गुरु के लिए कहा है कि—


गुरु गोबिन्द दोउ खडे काके लागूँ पाँय,
बलिहारी गुरु आपने गोबिन्द दियो बताय।


इसका मतलब यह है कि गुरु और ईश्वर दोनों साथ ही खड़े हैं इसलिए पहले किस के पैर छूने हैं ऐसी दुविधा आए तब पहले गुरु को वंदन करें क्युंकि उनकी वजह से ही ईश्वर के दर्शन हुए हैं। उनके बगैर ईश्वर तक पहुँचना असंभव है। 


कबीरजी का एक दूसरा प्रचलित दोहा है—


कबीरा ते नर अंध है गुरु को कहते और
हरि रूठे गुरु ठौर है गुरु रूठे नही ठौर


यानि की अंधा है वह जो गुरु को नहीं समझ पाता। अगर ईश्वर नाराज़ हो जाए तो गुरु बचा सकता है, लेकिन अगर गुरु नाराज़ हो जाए तब कौन बचाएगा। 


संत कबीर ने बरसों पहले कहा था कि—- 


‘‘गुरु लोभी शिष लालची दोनों खेलें दांव।
दोनों बूड़े बापुरै, चढ़ि पाथर की नांव।।


“गुरु और शिष्य लालच में आकर दांव खेलते हैं और पत्थर की नाव पर चढ़कर पानी में डूब जाते हैं।”
संत कबीर को भी हमारे अध्यात्म दर्शन का एक स्तंभ माना जाता है पर उनकी इस चेतावनी का बरसों बाद भी कोई प्रभाव नहीं दिखाई देता। आजकल के गुरु निरंकार की उपासना करने का ज्ञान देने की बजाय पत्थरों की अपनी ही प्रतिमाऐं बनवाकर अपने शिष्यों से पुजवाते हैं। देखा जाये तो हमारे यहां समाधियां पूजने की कभी परंपरा नहीं रही पर गुरु परंपरा को पोषक लोग अपने ही गुरु के स्वर्गवास के बाद उनकी गद्दी पर बैठते हैं और फिर दिवंगत आत्मा के सम्मान में समाधि बनाकर अपने आश्रमों में शिष्यों के आने का क्रम बनाये रखने के लिये करते हैं।


आजकल तत्वज्ञान से परिपूर्ण तो शायद ही कोई गुरु दिखता है। अगर ऐसा होता तो वह फाईव स्टार आश्रम नहीं बनवाते। संत कबीर दास जी कहते हैं कि-


‘‘सो गुरु निसदिन बन्दिये, जासों पाया राम।
नाम बिना घट अंध हैं, ज्यों दीपक बिना धाम।।’’
           
“उस गुरु की हमेशा सेवा करें जिसने राम नाम का धन पाया है क्योंकि बिना राम के नाम हृदय में अंधेरा होता है।”


राम का नाम भी सारे गुरु लेते हैं पर उनके हृदय में सिवाय अपने लाभों के अलावा अन्य कोई भाव नहीं होता। राम का नाम पाने का मतलब यह है कि तत्व ज्ञान हो जाना जिससे सारे भ्रम मिट जाते हैं। अज्ञानी गुरु कभी भी अपने शिष्य का संशय नहीं मिटा सकता।


संत कबीरदास जी कहते हैं कि- 
                
‘‘जा गुरु से भ्रम न मिटै, भ्रान्ति न जिवकी जाय।
सौ गुरु झूठा जानिये, त्यागत देर न लाय।।’’


“जिस गुरु की शरण में जाकर भ्रम न मिटै तथा मनुष्य को लगे कि उसकी भ्रांतियां अभी भी बनी हुई है तब उसे यह समझ लेना चाहिए कि उसका गुरु झूठा है और उसका त्याग कर देना चाहिए”
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जानिए क्या करें गुरु पूर्णिमा के दिन–
— जिसने अपने गुरु बनाए हैं वह गुरु के दर्शन करें। 
—- हिन्दु शास्त्र में श्री आदि शंकराचार्य को जगतगुरु माना जाता है इसलिए उनकी पूजा करनी चाहिए। 
— गुरु के भी गुरु यानि गुरु दत्तात्रेय की पूजा करनी चाहिए एवं दत बावनी का पठन करना चाहिए। 
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जानिए की ज्योतिष शास्त्र के अनुसार क्या हैं गुरुपूर्णिमा विशेष महत्व ?????


पण्डित “विशाल” दयानंद शास्त्री के अनुसार जिन लोगों की कुंडली में गुरुप्रतिकूल स्थान पर होता है, उनके जीवन में कई उतार-चढ़ाव आते है। वे लोग यदि गुरु पूर्णिमा के दिन नीचे लिखे उपाय करें तो उन्हें इससे काफी लाभ होता है। वैदिक ज्योतिष और स्वयं की कुंडली के आधार पर नीचे दी गयी स्थिति में गुरु यंत्र रखना चाहिए एवं गुरु यंत्र की पूजा करनी चाहिए- 


— आपकी कुंडली में गुरु नीचस्थ राशि में यानि की मकर राशि में है तो गुरु यंत्र की पूजा करनी चाहिए। 
— गुरु-राहु, गुरु-केतु या गुरु-शनि युति में होने पर भी यह यंत्र लाभदायी है। 
— आपकी कुंडली में गुरु नीचस्थ स्थान में यानि कि ६, ८ या १२ वे स्थान में है तो आपको गुरु यंत्र रखना चाहिए एवं उसकी नियमित तौर पर पूजा करनी चाहिए। 
—- भोजन में केसर का प्रयोग करें और स्नान के बाद नाभि तथा मस्तक पर केसर का तिलक लगाएं।
—– साधु, ब्राह्मण एवं पीपल के वृक्ष की पूजा करें।
—– गुरु पूर्णिमा के दिन स्नान के जल में नागरमोथा नामक वनस्पति डालकर स्नान करें।
—– पीले रंग के फूलों के पौधे अपने घर में लगाएं और पीला रंग उपहार में दें।
—— केले के दो पौधे विष्णु भगवान के मंदिर में लगाएं।
—– गुरु पूर्णिमा के दिन साबूत मूंग मंदिर में दान करें और 12 वर्ष से छोटी कन्याओं के चरण स्पर्श करके उनसे आशीर्वाद लें।
—- शुभ मुहूर्त में चांदी का बर्तन अपने घर की भूमि में दबाएं और साधु संतों का अपमान नहीं करें।
—— जिस पलंग पर आप सोते हैं, उसके चारों कोनों में सोने की कील अथवा सोने का तार लगाएं ।
— कुंडली में गुरु वक्री या अस्त है तो गुरु अपना बल प्राप्त नहीं कर पाता, इसलिए आपको इस यंत्र की पूजा करनी चाहिए। 
— जिनकी कुंडली में विद्याभ्यास, संतान, वित्त एवं दाम्पत्यजीवन सम्बंधित तकलीफ है तो उन्हें विद्वान ज्योतिष की सलाह लेकर गुरु का रत्न पुखराज कल्पित करना आवश्यक है। 
— इस के अलावा आपकी कुंडली में हो रहे हर तरह के वित्तीय दोष को दूर करने के लिए आप श्री यंत्र की पूजा करेंगे तो अधिक लाभ होगा। 
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आखिर गुरु और ज्ञान कैसे मिलें ???


वैसे तो आजकल सच्चे गुरुओं का मिलना कठिन है इसलिये स्वयं ही भगवान श्रीकृष्ण का चक्रधारी रूप मन में रखकर श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करें तो स्वतः ही ज्ञान आने लगेगा। दरअसल गुरु की जरूरत ज्ञान के लिये ही है पर भक्ति के लिये केवल स्वयं के संकल्प की आवश्यकता पड़ती है। भक्ति करने पर स्वतः ज्ञान आ जाता है। ऐसे में जिनको ज्ञान पाने की ललक है वह श्रीगीता का अध्ययन भगवान श्रीकृष्ण को इष्ट मानकर करें तो यकीनन उनका कल्याण होगा। गुरुपूर्णिमा के इस पावन पर्व पर ब्लाग लेखक मित्रों तथा पाठकों बधाई देते हुए हम आशा करते हैं कि उनका भविष्य मंगलमय हो तथा उन्हें तत्व ज्ञान के साथ ही भक्ति का भी वरदान मिले।
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हे गुरुवर !


 पूज्यवर ब्रह्मलीन स्वामी श्री श्री विश्वदेवानंद जी महाराज के श्री चरणों में समर्पित–





“वह शिष्य ही क्या जो आपसे मिलने की दुआ न करे ?
भूल कर अपने गुरुवर को जिंदा रहूँ कभी ये भगवान न करे ।
हमने जो रंग गुरु भक्ति का लगाया,आप उसे छूटने न देना ।
गुरुदेव आपकी याद का दामन,आप कभी छूटने न देना ॥
हमारी हर साँस में आप और आपका ही नाम रहे ।
हमारी प्रीति की यह डोरी,आप कभी टूटने न देना ॥
हमारी श्रद्धा की यह डोरी,आप कभी टूटने न देना ।
हमारे बढ़ते रहे कदम सदा आपके ही इशारे पर ॥
गुरुदेव !आपकी कृपा का सहारा छूटने न देना।
हम सच्चे बनें और सच्चाई के मार्ग पर चलें,
भूल से भी हमें झूट के मार्ग पर जाने ना देना ।
फरेब और धोखे की रीत है इस दुनिया में,
आपकी भक्ति को अब हमसे छूटने ना देना ॥
आपके प्रेम का यह रंग हमें रहेगा सदा याद,
मुश्किलों में भी यह कभी घटने ना देना।
मुश्किलों से भरकर रखी है करुणा आपकी,
मुश्किलों से थामकर रखी है श्रद्धा-भक्ति आपकी,
अपनी कृपा का यह छत्र कभी हटने ना देना ॥
आपकी भक्ति का सहारा कभी छूटने ना देना ।
आपकी प्रीति की यह डोर कभी टूटने ना देना ॥”


हे गुरुदेव ! गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व पर आपके श्रीचरणों में अनंत कोटि प्रणाम ||


आप जिस पद में विश्रांति पा रहे हैं, हम भी उसी पद में विशांति पाने के काबिल हो जायें,अब आत्मा-परमात्मा से जुदाई की घड़ियाँ ज्यादा न रहें और ईश्वर करे कि ईश्वर में हमारी भक्ति समाहित हो जाये || हे गुरुदेव !आपके साथ मेरी श्रद्धा की डोर कभी टूटने न पाये ||मैं प्रार्थना करता हूँ, हे गुरुदेव !आपके श्रीचरणों में मेरी श्रद्धा बनी रहे, जब तक है मेरी यह जिन्दगी है || प्रभु करे कि प्रभु के नाते आपके साथ हमारा हमेशा गुरु-शिष्य का सम्बंध बना रहे ||
‘जय हिंद,जय हिंदी’

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