जांनिये आज 6 मई ..20 को नृसिंह जयंती, पूजा व‍िध‍ि-व्रत कथा को—
 
 
नरसिंह जयंती, भगवान नरसिंह जी का जन्मोत्सव है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, भगवान नरसिंह जी का अवतरण वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन हुआ था। इस वर्ष यह तिथि 6 मई 2020 को पड़ रही है। इसलिए नरसिंह जयंती 6 मई को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान नरसिंह जगत के पालनहार विष्णु जी के छठे अवतार हैं। 
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नरसिंह जयंती 2020 मुहूर्त
नरसिंह जयंती सायंकाल पूजा का समय – 0.:50 PM से 06:27 PM 
अवधि – 02 घण्टे 37 मिनट्स 
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पारण समय – 05:2. AM, मई 07, 2020 
मध्याह्न संकल्प का समय – 10:36 AM से 01:13 PM, मई 07, 2020 
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चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ – मई 05, 2020 को 11:21 PM बजे 
चतुर्दशी तिथि समाप्त – मई 06, 2020 को 07:44 PM बजे
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जांनिये नरसिंह जयंती पूजा विधि—
सुबह जल्दी उठकर नित्य कर्मों से निवृत्त होकर स्नान करें।
व्रत का संकल् लें। 
भगवान नृसिंह और लक्ष्मीजी की प्रतिमा को स्थापित करें। 
पूजा में फल, फूल, पंचमेवा, केसर, रोली, नारियल, अक्षत, पीतांबर गंगाजल, काला तिल और हवन सामग्री का प्रयोग करें। 
भगवान नरसिंह को प्रसन्न करने के लिए नरसिंह गायत्री मंत्र का जपें। 
अपनी इच्छानुसार वस्त्रादि का दान भी करें।
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भगवान नृसिंह श्रीहर‍ि के चौथे अवतार माने जाते हैं। हमेशा की ही तरह व‍िष्‍णु भगवान ने यह अवतार भी अपने भक्‍त के कल्‍याण के लिए ही धारण क‍िया था। लेकिन यह अवतार अन्‍य अवतारों से थोड़ा अलग था। इसमें वह आधे सिंह और आधे मनुष्‍य के रूप में थे। यानी कि उनका स‍िर और धड़ तो मानव रूप में था। लेक‍िन चेहरा और पंजा स‍िंह की तरह था। यह रूप उन्‍होंने अपने भक्‍त प्रह्लाद की रक्षा और दैत्‍य हिरण्यकश्यपु के वध के लिए धारण किया था। यूं तो संपूर्ण भारत में नृसिंह भगवान की पूजा की जाती है। लेकिन दक्षिण भारत में वैष्‍णव संप्रदाय के लोग इन्‍हें व‍िपत्ति के समय रक्षा करने वाले देवता के रूप में पूजते हैं। बता दें कि वैशाख माह के अंतिम दिन यानी कि वैशाख पूर्णिमा के द‍िन नृसिंह जयंती मनाई जाती है। इस बार यह तिथ‍ि 6 मई को मनाई जा रही है।
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नरसिंह जयंती के दिन ही भगवान विष्णु ने आधा नर और आधा सिंह का अवतार लिया था जिसे नरसिंह अवतार के रूप में जाना जाता है. इस पर्व को पूरे देश में मनाया जाता है. दक्षिण भारत में वैष्णव संप्रदाय के मानने वाले इस पर्व को बहुत श्रद्धा भाव से मनाते हैं. मान्यता है कि नरसिंह भगवान विपत्ति के समय अपने भक्तों की रक्षा करते हैं. नरसिंह जयंती वैशाख महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है. इस बार यह चतुर्थी 6 मई यानी कल पड़ रही है,.
 
माना जाता है कि नरसिंह भगवान हर बड़े संकट से बचाते हैं. जिन लोगों के जीवन में आर्थिक संकट बना हुआ है, शत्रु परेशान कर रहे हैं या फिर कोई रोग लगातार पीड़ा पहुंचा रहा है तो ऐसे में नरसिंह जयंती पर भगवान नरसिंह की पूजा अच्छे परिणाम देने वाली मानी जाती है.
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यह रहेगा 6मई 2020 को नरसिंह जयन्ती पूजन मुहूर्त–
 
नरसिंह जयन्ती मध्याह्न संकल्प का समय – १०:५८ से १३:३८
 
चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ – मई ०५, २०२० को २३:२१ बजे
 
चतुर्दशी तिथि समाप्त – मई ०६, २०२० को १९:४४ बजे
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ऐसे करें नरसिंह जयन्ती 2020 पर पूजन-
 
भगवान नरसिंह की पूजा शाम के समय की जाती है. इस दिन भगवान नरसिंह की जल, प्रसाद, फल और पुष्प अर्पित करें. भगवान विष्णु पीतांबर प्रिय है इस दिन इसका अर्पण करना चाहिए. पूजा समापन के बाद जरुरमंदों को दान करें.
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ऐसे करें पूजा, होगी सभी मनोकामनाएं पूरी—
 
ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं क‍ि नृसिंह जयंती के द‍िन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सभी न‍ित्‍य कर्मों से निवृत्‍त हो जाएं। इसके बाद पूजा घर में भगवान नृसिंह और लक्ष्‍मीजी की प्रतिमा या फोटो स्‍थापित करें। इसके बाद वैद‍िक मंत्रों से पूजा करें। पूजा में फल, फूल, पंचमेवा, केसर, रोली, नार‍ियल, अक्षत, पीतांबर गंगाजल, काला तिल, पंच गव्‍य और हवन सामग्री का प्रयोग करें। भगवान नृसिंह की पूजा क‍िसी योग्‍य सद्गुरु के सान‍िध्‍य में सुपात्र व्‍यक्ति को ही करनी चाहिए। साथ ही यह व्रत करने के दौरान मन में किसी के भी प्रति ईर्ष्‍या-द्वेष की भावना नहीं आनी चाहिए। अन्‍यथा भगवान नृसिंह रुष्‍ट हो जाते हैं और पूजा का फल भी नहीं मिलता।
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श्री नृसिंह भगवान की पूजा में यह मंत्र है बेहद जरूरी–
 
पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि नृसिंह भगवान को पुष्‍प, गंध और फल चढ़ाने के बाद एकांत में कुश का आसन लगाएं। उसपर बैठकर रुद्राक्ष की माला से श्रद्धानुसार 1, 5 या 7 बार गायत्री मंत्र का जप करना चाहिए। इसके बाद व्रती को अपनी श्रद्धानुसार जरूरतमंदों और ब्राह्मणों को दान करना चाहिए। इसके अलावा एक और बात का ध्‍यान रखना चाहिए कि कभी भी व्रत के दौरान मन में किसी के भी प्रति ईर्ष्‍या-द्वेष की भावना नहीं आनी चाहिए।
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इस नृसिंह व्रत कथा को पढ़ने से दूर होते हैं सभी कष्‍ट—
 
कथा मिलती है कि प्राचीन काल में कश्‍यप नामक एक ऋषि थे। उनकी पत्‍नी थी द्विती। उनके दो पुत्र हिरण्‍याक्ष और हिरण्यकश्यपु हुए। हिरण्‍याक्ष के आतंक से सभी को मुक्‍त कराने के लिए भगवान व‍िष्‍णु ने वराह रूप धारण करके उसका वध कर द‍िया था। इसी बात का प्रतिशोध लेने के लिए हिरण्यकश्यपु ने कठोर तप किया। उसने ब्रह्माजी को प्रसन्‍न करके उनसे अमरता का आशीर्वाद मांगा। लेकिन ब्रह्माजी ने जब यह वरदान देने से मना कर द‍िया तो उसने उसकी मृत्‍यु न घर में, न बाहर, न अस्‍त्र से और न शस्‍त्र से, न द‍िन में, न रात में, न मनुष्‍य से न पशु से और न आकाश में न पृथ्‍वी में हो, यह वरदान मांगा। इसपर ब्रह्माजी तथास्‍तु कहकर अंतर्धान हो गए।
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तब लिया था भगवान श्रीहर‍ि ने नृसिंह अवतार—
 
ब्रह्माजी से वरदान प्राप्‍त करने के बाद हिरण्यकश्यपु ने खुद को भगवान मान लिया। उसने अपनी प्रजा को भी यह आदेश द‍िया कि सब उसको ही भगवान मानेंगे और उसकी ही पूजा करेंगे। उसने यह भी घोषणा करवाई कि जो भी उसकी बात नहीं मानेगा उसे मृत्‍युदंड द‍िया जाएगा। हिरण्यकश्यपु की बात सबने तो मान ली लेकिन उसके पुत्र प्रहृलादजी ने नहीं मानी। वह श्रीहर‍ि के अनन्‍य भक्‍त थे। द‍िन-रात उन्‍हीं की भक्ति में लीन रहते थे। हिरण्यकश्यपु ने कई बार उसे समझाने का प्रयास किया। लेकिन जब वह नहीं माने तो उन्‍हें मारने का प्रयास किया।
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खंभे को चीरकर जब प्रकट हुए श्रीहर‍ि–
 
कथा मिलती है कि हिरण्यकश्यपु के लाख समझाने और प्रयासों के बाद भी जब प्रह्लाद जी नहीं मानें। तो एक द‍िन उसने प्रह्लाद से पूछा क‍ि कहां रहता है तुम्‍हारा भगवान? उन्‍होंने कहा क‍ि वह तो सर्वत्र व्‍याप्‍त हैं। तब हिरण्यकश्यपु ने सामने खड़े खंभे को देखकर पूछा कि क्‍या इसमें हैं तुम्‍हारे भगवान? प्रह्लाद जी ने कहा कि हां, वह तो हर जगह हैं और इसमें भी हैं। यह सुनकर हिरण्‍यकश्‍यपु को गुस्‍सा आ गया और उसने क्रोध में आकर उसपर प्रहार कर द‍िया। तभी खंभे को चीरकर भगवान व‍िष्‍णु प्रकट हुए। जो कि न पशु थे न मनुष्‍य। उन्‍होंने हिरण्‍यकश्‍यपु के ब्रह्माजी से मांगे गए वरदान के अनुसार नृसिंह का रूप धारण किया था। इसके बाद हिरण्‍यकश्‍यपु को उन्‍होंने न द‍िन न रात यानी क‍ि गोधूलि बेला, न अस्‍त्र न शस्त्र यानी कि नाखून से, घर के अंदर न बाहर यानी कि घर की चौखट पर, न जमीन न आसमान तो अपनी गोद में बिठाया और अपने नाखूनों से उसका वध कर द‍िया।
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श‍िवजी ने शांत क‍िया भगवान नृसिंह का क्रोध—
 
हिरण्यकश्यपु के वध के बाद भी भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ। उनके इस व‍िकराल रूप से तीनों लोक कांपने लगे। तब सभी देवता श‍िवजी की शरण में पहुंचे और उनसे श्रीहर‍ि का क्रोध शांत करने की प्रार्थना की। इसके बाद भोलेनाथ ने शलभ अवतार लिया और नृसिंह को अपनी पूंछ से खींचकर पाताल लोक लेकर गए। वहां काफी देर तक उसे वैसे ही अपनी पूंछ में जकड़कर रखा। भगवान नृसिंह ने काफी प्रयास क‍िए लेकिन खुद को छुड़ा नहीं पाए। थोड़ी ही देर में नृसिंह भगवान ने भोलेनाथ को पहचान लिया और तब जाकर उनका क्रोध शांत हुआ। कहते हैं कि नृसिंह जयंती के दिन जो भी व्रत करके इस कथा को पढ़ता या सुनता है तो उसके सभी पापों का अंत हो जाता है। सारे दु:ख दूर हो जाते हैं और मनमांगी सारी मुरादें पूरी हो जाती हैं।
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भगवान नरसिंह के अवतरण की पौराणिक कथा–
पौराणिक कथा के अनुसार, हिरण्यकश्यप को ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त था कि वह न तो किसी मनुष्य द्वारा मारा जा सके न ही किसी पशु द्वारा। न दिन में मारा जा सके, न रात में, न जमींन पर मारा जा सके, न आसमान में। इस वरदान के नशे में आकर उसके अंदर अहंकार आ गया। जिसके बाद उसने इंद्र देव का राज्य छीन लिया और तीनों लोक में रहने वाले लोगों को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। उसने घोषणा कर दी कि मैं ही इस पूरे संसार का भगवान हूं और सभी मेरी पूजा करो। 
 
उधर, हिरण्कश्यप के स्वभाव से विपरीत उसका पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का बहुत बड़ा भक्त था। पिता के लाख मना करने और प्रताड़ित करने के बाद भी वह भगवान विष्णु की पूजा करता रहा। जब प्रहला ने अपने पिता हिरण्यकश्यप की बात नहीं मानी तो उसने अपने ही बेटे को पहाड़ से धकेल कर मारने की कोशिश कि, लेकिन भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रहलाद की जान बचा ली। इसके बाद हिरण्कश्यप ने प्रहलाद को जिंदा जलाने की नाकाम कोशिश की। 
 
अंत में क्रोधित हिरण्कश्यप ने अपने पुत्र प्रहलाद को दीवार में बांध कर आग लगा दी और बोला बता तेरा भगवान कहां है, प्रहलाद ने बताया कि भगवान यहीं हैं, जहां आपने मुझे बांध रखा है। जैसे ही हिरण्कश्यप अपने गदे से प्रह्लाद को मारना चाहा, वैसे ही भगवान विष्णु नरसिंह का अवतार लेकर खंभे से बाहर निकल आए और हिरण्कश्यप का वध कर दिया। जिस दिन भगवान नृसिंह ने हिरण्यकश्यप का वध करके भक्त प्रहलाद के जीवन की रक्षा की, उस दिन को नरसिंह जयंती के रूप में मनाया जाता है।

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