नागदेवता–खींवराज शर्मा—-

हिन्दू धर्म मान्यता है कि पृथ्वी शेषनाग के सिर पर रखी है। इसलिए ऐसा माना जाता है कि पाप कर्म बढ़ते हैं तो शेषनाग क्रोधित होकर फन हिलाते हैं और इससे पृथ्वी भी डगमगा जाती है। इस पुरातन मान्यता में छुपे भय से भी नाग पूजा की पंरपरा आगे बढ़ी। वास्तव में इस मान्यता का व्यावहारिक रुप यही है कि सर्प जाति पृथ्वी पर हर जगह मौजूद है। सागर से लेकर रेगिस्तान तक और पर्वत से लेकर मैदानों तक। इस तरह यह प्रकृति और मानव के संबंधों की अहम कड़ी है। हिन्दू धर्मग्रंथों में भी नाग जाति का संबंध अनेक रुपों में अलग-अलग देवी-देवताओं से बताया गया है। इसलिए भी नाग जाति का बहुत धार्मिक महत्व है। पुराण और शास्त्रों के अनुसार अलग-अलग युग और काल में नाग वंश अनेक रुपों में आया है:
पुराणों में लिखा है कि समुद्र-मंथन में वासुकी नाग को मंदराचल पर्वत के आस-पास लपेटकर रस्सी की तरह उपयोग किया गया।
भगवान शंकर को नाग देवता बताया गया है। उनके पूरे शरीर पर ही नागों का वास माना गया है। जैसे गले में नागों का हार, कानों में नाग कुण्डल, सिर पर नाग मुकूट और कमर व छाती पर भी नाग ही शोभा बढ़ाते हैं। शिव की स्तुति शिवाष्टक में भी वर्णन है कि: “गले रुंडमालम तनौ सर्पजालं” जिसका मतलब है शंकर का पूरा शरीर सांपों के जाल से ढंका है।
इसी प्रकार भगवान विष्णु शेषनाग द्वारा बनाई गई सांप की शैय्या पर शयन करते हैं। भगवान विष्णु के ध्यान मंत्र में यही बोला जाता है कि: “शांताकारम भुजग शयनं पद्मनाभं सुरेशं”.
रामायण में विष्णु अवतार भगवान श्री राम के छोटे भाई लक्ष्मण और महाभारत में श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम को शेषनाग का अवतार बताया गया है।
रामायण में सुरसा राक्षसी नागों की माता बताई गई है। इसी प्रकार महाभारत में अर्जुन द्वारा नागकन्या उलूपी से विवाह का प्रसंग मिलता है।
दधीची ऋषि की अस्थियों से बने अस्त्र से इन्द्र के हाथों मारा गया वृत्तासुर भी नागराज ही था।

वेदों में सांप का नाम अहि मिलता है। इसके अलावा अनेक रुपों में नाग जाति के बारे में लिखा गया है।

नागपंचमी विशेषः जीवनदाता नागदेवता—

बरसात के मौसम में बिलों से निकलने वाले इन सर्पो का कोई भयवश वध न कर दे, इसलिए इनकी पूजा का विधान किया गया है क्योंकि सांप सिर्फ भक्षक ही नहीं कीट-पतंगों और चूहों से फसलों के रक्षक भी हैं।

पूजा-विधान—-

प्राय: सभी मानव जातियों में नाग किसी-न-किसी रूप में पूजे जाते हैं, लेकिन भारत में उनकी पूजा प्रत्यक्ष देवता के रूप में बड़ी श्रद्धा से की जाती है। कारण हम मानते हैं वसुधैव कुटुम्बकम अर्थात समूची धरती के सभी वासी हमारे परिजन ही हैं। भले ही वे नाग या सर्प ही क्यों न हों।

प्राचीन मान्यता—-
मान्यता है कि नाग सृष्टि के जन्म के साथ ही उत्पन्न हुए। उनकी चर्चा वेदों से लेकर पुराणों तक और रामायण से लेकर महाभारत तक कई रूपों में मिलती है। पौराणिक मान्यता है कि वे कश्यप और कद्रु की संतान हैं। शतपथ ब्राम्हण में महानाग के अर्थ में नाग शब्द का उल्लेख हुआ है।

वृहदारण्यक उपनिषद और ऐतरेय ब्राrाण में भी इसके संदर्भ मिलते हैं, जो सर्प के अर्थ में प्रयोग किए गए हैं। इस अर्थ में नाग और सर्प का साम्य नजर आता है। भारतीय मान्यता में जिन तीन प्रमुख लोकों स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल की चर्चा है, उनमें पाताल इनका लोक माना गया है। रामायण की रामकथा में राम-रावण युद्ध के दौरान पाताल लोक का नागवंशी और रावण का रिश्ते का भाई अहिरावण राम, लक्ष्मण का अपहरणकर्ता निरूपित किया गया है।

नाग की महत्ता—–
नागों की महत्ता कई रूपों में व्यक्त हुई है। भारतीय मान्यता है कि पृथ्वी को शेषनाग ने अपने मस्तक पर मणि की भांति धारण किया हुआ है। विष्णु की शैया यही शेषनाग है। शंकर के आभूषण नाग हैं, इसीलिए उनका एक नाम नागेश या नागेश्वर भी है। कृष्ण के जीवन में कालिया दमन की कथा नाग के संदर्भो को सामने लाती है। महाभारत में भीम नागलोक में जाकर उत्पात मचाते हैं और फिर नागों से सौ हाथियों का बल ले उपकृत हो पुन: पृथ्वी पर लौट आते हैं।

देवियों के हाथों में नाग चित्रित किया गया है तो जैन र्तीथकरों के चित्रों में भी नाग दृष्टिगोचर होते हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि समुद्र मंथन की जो प्राचीन कथा भारतीय साहित्य में मिलती है, उसमें भी वासुकी नाग को रस्सी बनाकर अमृत संधान का प्रयत्न नजर आता है। इससे नागों की महत्ता तो पता लगती ही है, यह भी संकेत मिलता है कि अमृत की खोज में विषधर नाग कितने उपयोगी सिद्ध हुए हैं।

आकर्षण का केंद्र—-
नाग या सर्प अपने विष, अपनी चपलता, अपनी सर्वउपलब्धता और अपने रहस्यमय व्यक्तित्व और स्वरूप के कारण प्रारंभ से ही आकर्षण का केंद्र रहे हैं। ये अनजाने ही भय भी उत्पन्न करते हैं। नाग अकेले हैं, जो रेगिस्तान से लेकर समुद्रों तक, नदियों से लेकर वनों तक, हिमालय से लेकर पथरीले पर्वतों तक और नगरों से लेकर उपवनों तक सभी जगह उपलब्ध होते हैं। हजारों प्रजातियों के रूप में और अनगिनत रंग-रूप में। कोई विषधर है तो कोई विषरहित, लेकिन सभी अपनी ओर खींचते हैं, डराते हैं और पूजन के लिए प्रेरित करते हैं।

नागों से जुड़ी किंवदंतियां—
नागों से जुड़ी किंवदंतियां भी कम नहीं हैं। यह कि नाग बदला लेते हैं, धन के रक्षक हैं, आसमान में उड़ते भी हैं, नाग कन्याएं होती हैं, जिन्हें विष कन्या भी कहते हैं। उनसे जुड़े मायाजाल हैं, उनसे जुड़े नागपाश जैसे शस्त्र हैं, जो महाबलवान हनुमानजी तक को बांधने में सक्षम होते हैं।

रावण का पुत्र इंद्रजीत अशोक वाटिका में हनुमान से हुई लड़ाई में अंत में उन्हें नागपाश से ही बांधकर रावण के समक्ष ले गया था। ये किंवदंतियां कितनी सच हैं और इनका कितना पुष्ट वैज्ञानिक आधार है, यह आज तक प्रमाणित या खंडित नहीं किया जा सका है। यही कारण है कि नाग हमारे जीवन, हमारी परंपराओं में गहरे तक जुड़ गए हैं। इतने गहरे कि पंचमहाभूतों के प्रतीकों में भी उन्होंने स्थान पा लिया है।

नाग पूजन का महत्व—
नागपंचमी के रूप में नागों की पूजा प्रकृति और जीव-जंतु मात्र की पूजा का प्रतीक है। नागपंचमी श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाई जाती है। कारण वर्षा शुरू होते ही कृषि प्रधान भारत में कृषक खेतों की ओर जाते हैं तथा बिलों में पानी भरने के कारण सर्प बाहर आ जाते हैं।

भय में कोई इन सर्पो का वध न कर दे, इसलिए इस दिन उनकी पूजा का विधान किया गया है क्योंकि सांप सिर्फ भक्षक ही नहीं कीट-पतंगों और चूहों से फसलों के रक्षक भी हैं। प्राय: समूचे भारत में नागपंचमी पर नाग की पूजा प्रत्यक्ष, मूर्ति या भित्ती चित्रों के रूप में की जाती है। उन्हें दूध का परंपरागत भोग लगाया जाता है। हालांकि नए शोध बताते हैं कि सांप कतई दूध नहीं पीते। सांप के विष का प्रयोग जीवनरक्षक औषधि बनाने में भी किया जाता है।

नागपंचमी विधान—

नागपंचमी श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाई जाती है। समूचे भारत में नागपंचमी पर नाग की पूजा प्रत्यक्ष, मूर्ति या भित्ती चित्रों के रूप में की जाती है। उन्हें दूध का परंपरागत भोग लगाया जाता है।

नाग देवता का धर्मग्रंथों में उल्लेख –नागपंचमी विशेष—-

धर्मग्रन्थों में नाग को देवता माना गया है और इनका विभिन्न जगहों पर उल्लेख भी किया गया है। हिन्दू धर्म में कालिया, शेषनाग, कद्रू (साँपों की माता) पिलीवा आदि बहुत प्रसिद्ध हैं।

कथाओं के अनुसार दक्ष प्रजापति की पुत्री तथा कश्यप ऋषि (जिनके नाम से कश्यप गोत्र चला) की पत्नी ‘कद्रू’ नाग माता के रूप में आदरणीय रही हैं। कद्रू को सुरसा के नाम से भी जाना जाता है।

गोस्वामी तुलसीदास की श्रीरामचरितमानस के अनुसार जब हनुमानजी समुद्र पार कर रहे थे, तब देवताओं ने उनकी शक्ति की परख करने की इच्छा से नागमाता ‘सुरसा’ को भेजा था। बल-बुद्धि का परिचय देकर हनुमानजी उनके मुख में प्रवेश कर कान की ओर से बाहर आ गए थे।

पहले हनुमानजी और सुरसा ने अपना-अपना शरीर विराट कर लिया था। तब हनुमानजी ने लघु रूप धारण कर सुरसा को संतुष्ट किया था। महाभारत में एक ऋषि आस्तीक का नाम भी सर्प कथा से जुड़ा है।

आस्तीक ने जनमेजय के सर्पयज्ञ में पातालवासी तक्षक सर्प को भस्म होने से बचाया था। ये ऋषि वासुकी नाग की बहन जरत्कारू की संतान थे। इसलिए ऐसा माना जाता है कि ‘आस्ती, आस्ती पुकारने से सर्प क्रोध शांत हो जाता है।’

वैज्ञानिक भी इस तर्क को स्वीकार करते हैं कि कंपन की गूँज से साँप प्रभावित होता है इसलिए संगीत की लय पर सर्प थिरकता है। बृहदारण्यक उपनिषद् में भी नागों का उल्लेख मिलता है।

नागपूजा या सर्पपूजा किसी न किसी रूप में विश्व में सब जगह की जाती है। दक्षिण अफ्रीका में कई जातियों में नाग को कुलदेवता के रूप में पूजा जाता है। ऐसा समझा जाता है कि कुल की रक्षा का भार सर्पदेव पर है।

कई जातियों ने नाग को अपना धर्मचिह्न स्वीकार किया है। सर्प का वध करना घोर पाप समझा जाता है। ऐसा भी मान्यता है कि पूर्वज सर्प के रूप में अवतरित होते हैं।

शिव की आराधना भी नागपंचमी के पूजन से जुड़ी है। पशुओं के पालनहार होने की वजह से शिव की पूजा पशुपतिनाथ के रूप में भी की जाती है। शिव की आराधना करने वालों को पशुओं के साथ सहृदयता का बर्ताव करना जरूरी है।

उत्तरप्रदेश के अनेक भागों में नागपंचमी का पर्व शिव के ‘रिखेश्वर स्वरूप’ की पूजा के रूप में मनाया जाता है। शिव ने नाग को धारण किया है और समुद्र मंथन के दौरान जब विष निकला था तब उस कालकूट का उन्होंने पान किया था, जो उनके गले में ही अटक गया था। इसलिए उन्हें नीलकंठ नाम से भी पूजते हैं।

आचार्य रजनीश के अनुसार विषपान करने वाला ही मृत्युंजय हो सकता है। इसलिए शिव में सच्चिदानंद का स्वरूप प्रकट है। इसलिए नागपूजा और नागपंचमी विशेष रूप से शिव से और विष्णु से भी जुड़ी है।

सर्पों की माताओं में सुरसा के साथ मनसा माता का भी नाम आता है। भारत के अनेक हिस्सों में मनसा माता के मंदिर बने हुए। जहाँ इनकी आराधना होती है और नागपंचमी को मेले भी लगते हैं। इन्हें शक्ति के रूप में भी पूजा जाता है। ये ‘मनसा मंगल’ के नाम से भी विख्यात हैं। ऐसी मान्यता है कि इनकी पूजा से सर्पों का क्रोध शांत हो जाता है और कोई जनहानि नहीं होती है।

जिस तरह से सोमवार, एकादशी व अन्य व्रत रखे जाते हैं, उसी तरह कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को नागव्रत रखने का भी शास्त्रों में उल्लेख है। इस दिन निराहार रहकर व्रत किया जाता है। अलग-अलग नागों का पूजन किया जाता है।

अनेक स्थानों पर नागमूर्तियों का भी पंचामृत से पूजन किया जाता है। मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को नागपूजा का अनुष्ठान होता है। पुराणों में जितने भी प्रकार के सर्पों का उल्लेख है, विशेष रूप से वासुकी, तक्षक, मणिभद्र, धृतराष्ट्र, कार्कोटक, धनंजय आदिसर्पों को दूध से स्नान कराया जाता है या इनकी प्रतिमा की पूजा की जाती है।

यदि वर्षभर पूजा न भी हो पाए तो नागपूजन की तिथि के दिन नागों की पूजा करने से सभी दिन पूजन के बराबर फल मिलता है।

इतने विशाल पैमाने पर विश्व में नागपूजा होने के बावजूद नागों की कई नस्लें विनाश की कगार पर हैं। नागरक्षा के बारे में पर्यावरणवादियों ने निश्चित ही जनजागरण किया है परंतु यदि हम एक दिन नाग की पूजा करें और बाकी तीन सौ चौंसठ दिन नाग को मारें तो हमारी पूजा भी व्यर्थ है।

कृषि पंडित नागों को खेती के लिए उपयोगी मानते हैं। धर्म सही मायने में तभी फलदायी होता है जबकि उसके प्रति वैज्ञानिक रवैया अपनाया जाए और नागपूजा के साथ नागरक्षा के प्रति भी हम वचनबद्ध रहें।

पूज्य नागदेवता—–

सूर्य, गौ, वृक्ष, नदी की तरह सर्प भी प्रत्यक्ष देवता हैं। प्राय: बाकी देवता जिनकी परिकल्पना हमारे शास्त्रों ने की है उनका स्वरूप कल्पित है किंतु सर्प साक्षात दर्शन देते हैं। जल की भांति सर्प की उपस्थिति धरती से आकाश तक स्वीकारी गई है। संभवत: पूरी सृष्टि पर एकमात्र सर्प ही हैं जो जल, थल, वृक्ष, झाड़ियों, पहाड़ों, बर्फ, बिल, खेत आदि हर स्थान पर अपना अस्तित्व सिद्ध करते हैं। इतिहास में नाग राजाओं का उल्लेख है तो पुराणों में नाग कन्याओं से कई नायकों-प्रतिनायकों के विवाह या प्रेम संबंधों की चर्चा आती है। नागों का लोक पाताल माना गया है।

इतिहास और पुराण सहित धर्म की सभी धाराओं तथा ज्ञान की शाखाओं में सर्प की चर्चा किसी न किसी रूप में उपलब्ध है जो सर्पो की चिरकालिकता को प्रदर्शित करती है। यही कारण है कि सर्प प्रारंभ से पूजनीय माने गए हैं और उनकी पूजा के निमित्त भारतीय मनीषा में श्रावण शुक्ल पंचमी का दिन निश्चित किया गया है। पौराणिक, ऐतिहासिक संदर्भो के साथ सर्प के रहस्यमय शारीरिक स्वरूप और उसकी विषधारी वृत्ति ने कालांतर में कई लौकिक-अलौकिक, रहस्य-इंद्रजाल से भरी कथाओं को जन्म दिया और लोकमानस में सर्प के प्रति एक अजीब से भय को भी स्थापित कर दिया। परिणाम यह कि आज भी सर्प हमारे लिए भय, आश्चर्य और रहस्य का केंद्र बने हुए हैं। इसीलिए धर्मालु भारतीय सर्प की पूजा कर उसके संभावित क्रोध से मुक्ति के उपाय खोजते हैं।

श्रावण शुक्ल पंचमी को नागपंचमी के रूप में सर्प की पूजा के पीछे हमारी अर्थव्यवस्था का दर्शन भी जुड़ा हुआ है। ये दिन बारिश के होते हैं और इसी दौरान खेतों में काम चलता है। आषाढ़ की रिमझिम वर्षा धरती को भिगों पाती है लेकिन जब श्रावण में वर्षा अपना रंग दिखाती है और सर्प के बिल पानी से भर जाते हैं तब सर्प बिल से निकलकर खेतों में आ जाते हैं। तब हमारे सामने दो विकल्प होते हैं – भयभीत होकर सर्प को मार दिया जाए या बड़ी होती फसल की कीटों-चूहों से रक्षा के लिए उसे पर्यावरण का एक अभिन्न अंग स्वीकार कर छोड़ दिया जाए। भारतीय दूसरा विकल्प स्वीकारते हैं और सर्प की पूजा कर उसे अपना मित्र बना लेते हैं। इसीलिए इन्हीं दिनों सर्प की पूजा पंचमी के बहाने की जाती है।

जहां तक ज्योतिष का प्रश्न है, सर्प यहां भी उपस्थित हैं। नवग्रहों में राहु के दोष से पीड़ित सर्प का पूजन करते हैं। ज्योतिष कहता है कि हर ग्रह के दो देवता होते हैं। उदाहरणार्थ सूर्य के अधिदेवता ईश्वर हैं और प्रतिदेवता अग्नि। ठीक इसी तरह राहु के अधिदेवता काल और प्रतिदेवता सर्प माने गए हैं। यही कारण है कि जिन लोगों की कुंडली में राहु के दोष होता है उन्हें अधिदेवता काल और प्रतिदेवता सर्प की पूजा कर कालसर्प दोष को दूर करने का उपाय करना पड़ता है। राहु दोष में जिस कालसर्पदोष की चर्चा है उसका आशय है कि यदि वह दोष है तो मनुष्य का स्वभाव चंचल हो जाता है। यानी उसके कार्य विघ्न वाले होते हैं और उसकी निर्णय क्षमता प्रभावित होती है। तब सर्पदोष के निदान के लिए सर्प के उपाय सुगंधित श्वेत वस्तुएं और नैवेद्य चढ़ाकर दोष का शमन करने की परंपरा है।

कहते हैं यदि किसी की कुंडली में कोई दोष हो तो उसे साक्षात ब्रrा भी दूर नहीं कर सकते, किंतु उपायों के माध्यम से उसका शमन अवश्य किया जा सकता है। आशय है कि ज्योतिष में सर्प है। राहु के साथ भी और नक्षत्रों के संदर्भ में भी। .7 नक्षत्रों में अश्लेषा नक्षत्र के देवता के रूप में भी सर्प उपस्थिति दर्ज कराते हैं। अश्लेषा का स्वामी सर्प ही माना गया है। ठीक इसी तरह बारिश के दिनों में सूर्य जब रोहिणी से हस्त नक्षत्र के बीच गमन करता है तो इन नक्षत्रों में एक का वाहन सर्प भी होता है और इन्हीं वाहनों से ज्योतिषी वर्षा का होना, न होना, कम या ज्यादा होना आदि का आकलन करते हैं।

इतिहास, पुराण, वास्तु, धर्म, ज्योतिष आदि के संदर्भ भले किसी ठोस वैज्ञानिक आधार के साथ सर्प के स्वरूप, स्वभाव पर फोकस न करें, लेकिन नागपंचमी को सर्पपूजन की परंपरा उसके प्रति आस्था और उसे अपने प्राकृतिक मित्र समझने की परंपरा के पीछे ठोस आधार अवश्य हैं और वह यह कि सर्प भी इस सृष्टि की प्राणी हैं और सृष्टि के सौदंर्य का अंग। हम लाठी उठाएं तो वह शत्रु हैं और शीश झुकाए तो मित्र, देवता। बेहतर होगा हम उसे मित्र मानकर देवता के आसन पर ही रखकर पूजे।

नाग देवता की आंखों देखी कहानी—–
कहानी कोई बनावटी नही है,एक हकीकत का बयान है,जिसे मैने अपनी आंखों से देखा है,मेरी कुन्डली मे कालसर्प दोष है,कई प्रकार के प्रयोग जैसे भी वैदिक रीति से किये जाते है किये लेकिन कोई बडा असर समझ में नही आया,हमारे एक बुजुर्ग ने कहा कि कालसर्प दोष एक प्रकार का पितर दोष है जो पितरों के असंतुष्ट होने के कारण होता है,अगर किसी प्रकार से बद्रीनाथ से अलकनन्दा (गंगा जी का प्रथम उदगम नाम) से पानी लेकर रामेश्वरम में चढाया जाये,और बद्रीनाथ में ही “ब्रह्मकपाल” नामक स्थान पर पितरों के नाम से पिंड-दान किये जायें तो काफ़ी राहत मिल सकती है,मै कोई धनवान तो हूँ नही जो फ़टाफ़ट धन का उपयोग कर गाडी आदि से बद्रीनाथ जा सकूं,जयपुर से बद्रीनाथ जाने के लिये पहले दिल्ली जाओ फ़िर वहां से हरिद्वारा और वहां से बद्रीनाथ का साधन मिनी बसों के रूप में हासिल होता है,सो किराये का बन्दोबस्त करने के बाद हम दोनो पति पत्नी बद्रीनाथ के लिये प्रस्थान कर गये,ऋषिकेश के आगे जाने पर पता लगा कि पहाड खिसक गया है और रास्ता बन्द है,इसलिये हम लोग उस जाने वाली बस के साथ एक सुनसान स्थान पर नौ घंटे पडे रहे और रास्ता साफ़ होने पर आगे गये,सुख दुख सहते हुये बद्रीनाथ जा पहुंचे,बहुत सर्दी थी,जयपुर में तो तापमान उस समय पैंतालीस डिग्री का था,लेकिन वहां पर तापमान चार डिग्री के आसपास था,गर्म कपडे लेजाने से कोई विशेष कठिनाई नही हुयी,और आराम से बद्रीनाथ का दर्शन करने के बाद ब्रह्मकपाल पर पितरों के नाम के पिंड-दान करने के बाद अलकनन्दा का जल लेकर हम लोग वापस रामेश्वरम जाने के लिये तैयार हुये,दिल्ली से चैन्नई के लिये इन्डिगो नामक एयर कम्पनी से टिकट बुक करवाने में मुम्बई के पास के एक शिष्य संजय पंवार ने मेरी सहायता की और हम लोग नवरात्रा मे ही रामेश्वरम जा पहुंचे,वहां पर पुजारी से यह कहने पर कि यह पानी बद्रीनाथ से लाया गया है,वह बहुत खुश हुया और पूरे मन्दिर में एक बार तो हर हर की आवाज के साथ पूरा मन्दिर गूंज गया,आवाज को सुनकर रोंगटे खडे हो गये,बहुत आनन्द आया कि बद्रीनाथ के जल की रामेश्वरम में बहुत अधिक महिमा है। भगवान शिव जी से प्रार्थना की कि हे ! प्रभु मेरा यहां बार बार आना मुश्किल है,कोई ऐसा उपाय करो कि मुझे बार बार यहां आना न पडे। यह प्रार्थना करने के बाद हम दोनो पति पत्नी ने मानस धनुषकोटि जाने का बनाया,रामेश्वरम मन्दिर के पूर्वी गेट के बाहर से ही तीन नम्बर बस धनुषकोटि के लिये मिलती है,किराया कोई खास नही है केवल प्रति यात्री तीन रुपया है,एक बार तो तमिलनाडु सरकार के लिये नतमस्तक होना पडता है कि जनसेवा के मामले में वह सरकार काफ़ी लचीली है। रामेश्वरम मन्दिर से धनुषकोटि की दूरी सत्रह किलोमीटर है,हम दोनों धनुष कोटि जाने के लिये मुख्य बस स्टेंड पर जा पहुंचे वहां से जहां पर दोनो समुद्र मिले हैं वहां तक जाने के लिये मछली वाली गाडियां कच्चे रास्ते मे जाने के लिये मिलती है,वे पचास रुपया प्रति यात्री लेती है लेकिन सात किलोमीटर का रेत में जाने का सफ़र बहुत अधिक महत्व रखता है। हम दोनो धनुषकोटि मुख्य समुद्रों के संगम पर जा पहुंचे,चूंकि मुझे तैरना आता है इसलिये समुद्र में नहाने से मैं अपने को नही रोक सका और समुद्र में नहाने के लिये कूद गया,बडी बडी लहरें आ रहीं थी और किनारों पर टकराकर अपनी शक्ति को समाप्त कर रहीं थी,मैं भी अपने आवेश में समुद्र में कूद गया,नहाने लगा,नमकीन पानी मुंह मे जाने लगा लेकिन समुद्र की ठंडक मन को अच्छी लग रही थी इसलिये आराम से नहाने लगा,अचानक लहर के साथ एक काली सी चीज आकर मेरे पास पहुंची मैने उसे उत्सुकतावश हाथ मे ले लिया,देखा तो वह एक सांपों की लिपटी हुई लकडी की मूर्ति ही थी,झटपट बाहर आया,देखा तो वास्तव में पांच सांपों के अन्दर उन्नीस सांप एक साथ लिपटे थे,लेकिन लकडी के रूप में थे,मैने अपनी पत्नी को दिखाया पहले तो पत्नी ने कहा कि समुद्र में ही बहा दो,लेकिन मैने ऐसी मूर्ति नही देखी थी इसलिये लोभ से अपने पास रख ली और वापस लेकर रामेश्वरम तथा वहां से घर लेकर आया,वह मैने अपने पूजा स्थान में रख ली है उसकी फ़ोटो मैं नीचे लगा रहा हूँ,आप देखिये क्या यह संसार में सम्भव है कि इस प्रकार की सांपों की मूर्ति मिल सकती है।

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