आइये जाने क्या और क्यों हैं अपराध और ज्योतिष का सम्बन्ध ??
प्रिय मित्रों / पाठकों,
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज का एक सदस्य है और समाज के अन्य सदस्यों के प्रति प्रतिक्रिया करता है, जिसके फलस्वरूप समाज के सदस्य उसके प्रति प्रक्रिया करते हैं। यह प्रतिक्रया उस समय प्रकट होती है जब समूह के सदस्यों के जीवन मूल्य तथा आदर्ष ऊॅचे हों, उनमें आत्मबोध तथा मानसिक परिपक्वता पाई जाए साथ ही वे दोषमुक्त जीवन व्यतीत करते हों। परिणाम स्वरूप एक स्वस्थ समाज का निमार्ण होगा तथा समाज में नागरिकों का योगदान भी साकारात्मक होगा। सामाजिक विकास में सहभागी होने के लिए ज्योतिष विषलेषण से व्यक्ति की स्थिति का आकलन कर उचित उपाय अपनाने से जीवन मूल्य में सुधार लाया जा सकता है साथ ही लगातार होने वाले अपराध, हिंसा से समाज को मुक्त कराने में भी उपयोगी कदम उठाया जा सकता है। अपराध अनेक प्रकार के होते हैं। इस बिन्दु के अन्तर्गत सभी को परिभाषित करना दुष्कर कार्य है।
 
व्यक्ति के चरित्र एवं उसकी मानसिक अवस्था को परिभाषित करने में लग्न महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। लग्न से ही मनुष्य की आकृति एवं स्वाभाविक प्रवृत्ति का अनुमान लगाया जाता है। चन्द्रमा से मन की प्रकृति एवं प्रवृति का आकलन किया जाता है तथा इन दोनों पर पड़ने वाले अन्य ग्रहों के प्रभाव से उस जातक के अहं को उकसाने वाली शक्ति का आकलन किया जाता है।  लग्न महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। लग्न ही मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है, जो उस जातक के अहं को उकसाती है। छठा भाव मनुष्य के आन्तरिक पाप का है और असामाजिक तत्त्व पैदा करता है। 
आज का युवा वर्ग सबसे अधिक फिल्मों से प्रभावित होता है बाल कटवाने से लेकर कपड़ों की डिजाइन तक में फिल्मी अभिनेता अभिनेत्रियों की नक़ल करता है जन्म दिन के केक काटने ,प्रेम करने से लेकर विवाह करने तक का हर आचरण आजकल फिल्मों से ही  सीखा जाता है हत्यारों से लेकर अपहरण करने वाले हों या लुटेरे सारे लोग अपनी अपनी कला फिल्मों से ही सीख रहे हैं जब सारे अपराधियों पर फिल्मों का इतना बड़ा प्रभाव है तो बलात्कारी अपनी अकल से क्यों करते होंगे बलात्कार !इसमें भी फिल्मों की नक़ल होगी !इसलिए बलात्कार रोकने के लिए फिल्मी बलात्कारों पर लगाई जाए लगाम || फिल्मी कलाकारों मॉडलों की नक़ल करके यदि आधे चौथाई कपड़े  पहने जाने लगे हैं तो फिल्मी बलात्कारों की नकल करके ही बलात्कारी बनने लगे हैं युवा !यदि बलात्कार बंद करना ही है तो ऐसी फिल्में ही क्यों न रोक दी जाएँ !और फिल्मी रहन सहन पहनावा से परहेज किया जाए !फिल्में मनोरंजन हैं इन्हें वहीँ तक सीमित रहने दिया जाए !इन्हें देखकर परम्पराओं और संस्कारों से छेड़ छाड़ ठीक नहीं !
छल-कपट और धूर्तता से ऊपर उठे लोग जल्दी ही हाशिये पर चले जाते हैं। इन सब बातों की पुष्टि ऐसे व्यक्तियों की कुण्डलियों में हो रहे मंगल-शुक्र के सुखद संयोग से की जा सकती है, जो असंख्य लोगों को अपना दीवाना बना लेते हैं। चन्द्र-मंगल संबंध भी इसी संदर्भ में प्रशंसनीय माने गये हैं और विशद् विश्लेषण के लिए प्राचीन ज्योतिषीय ग्रंथों में यत्र-तत्र बिखरे अन्य ऐसे ही योगों पर ध्यान देना होगा। 
मित्रों/ पाठकों, कुछ कुण्डलियां ऐसी होती हैं जिनसे ज्ञात होता है कि वह व्यक्ति अपराध तो करेगा किन्तु अपराध का दण्ड कारावास आदि उसे प्राप्त नहीं होगा। कुछ कुण्डलियां से ज्ञात होता है कि अपराध का दण्ड कारावास आदि उसे अवश्य भुगतना पड़ेगा। किन्तु ऐसी कुछ ही कुण्डलियां होती हैं, जहां अपराध की इस रूप में परिणति दिखाई देती है। प्राय: ऐसा तो हम सबके साथ ही होता है कि हम किसी मानसिक दबाव के कारण उन्माद में आकर आपराधिक प्रतिक्रिया कर बैठते हैं किन्तु ऐसा केवल मानसिक सोच तक ही सीमित रहता है। अर्थात प्रतिक्रिया स्वरूप हम अपराध के विषय में सोचते तो हैं, किन्तु ऐसा कुछ करते नहीं, जिसके करने से कानून का उल्लंघन होता हो।
चाहे जीवन हो ज्योतिष ये सब कर्म ही तो हैं जो इनका निर्धारण करते हैं !जीवन और ज्योतिष में कर्मों के सम्बन्ध और महत्त्व को समझने लिए ही कर्मों के सिद्धांत को पहले समझना आवश्यक सा देख पड़ता है !कृष्णमूर्ति जी ने अपनी पुस्तक में में कर्मों की तीन श्रेणियों का जिक्र किया है ! 
.. दृढ़ कर्म       
.. दृढ़ अदृढ़ कर्म          
.. अदृढ़ कर्म 
1. दृढ़ कर्म:- कर्म की इस श्रेणी में उन कर्मों को रखा गया है जिनको प्रकृति  के नियमानुसार माफ नहीं किया जा सकता !जैसे क़त्ल,गरीबों को उनकी मजदूरी न देना,बूढ़े माँ – बाप को खाना न देना ये सब कुछ ऐसे कर्म हैं जिनको माफ नहीं किया जा सकता ! ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में चाहे कितने ही शांति के उपाय करे लेकिन उसका कोई भी प्रत्युत्तर उन्हें देख नहीं पड़ता है ,चाहे ऐसे व्यक्ति इस जीवन में कितने ही सात्विक जीवन को जीने वाले  हों लेकिन उनको जीवन कष्टमय ही गुजरना पड़ता है वे अपने जीवन के दुखों को दूर करने के लिए विभिन्न ज्योतिषीय उपाय करते देखे जाते हैं लेकिन अंत में हारकर उन्हें यही कहने के लिए मजबूर होना पड़ता है,कि ज्योतिष और उपाय सब कुछ निरर्थक है ,लेकिन ये बात तो एक सच्चा ज्योतिषी ही  जानता है कि क्यों यह व्यक्ति कष्टमय जीवन व्यतीत करने को  बाध्य है !
2.दृढ़ अदृढ़ कर्म:-कर्म की इस श्रेणी में जो कर्म आते है उनकी शांति उपायों के द्वारा की जा सकती है अर्थात ये माफ किये जाने योग्य कर्म होते हैं !जैसे कोई  व्यक्ति कोलकाता जाने लिए टिकट लेता है परन्तु भूलवश मुम्बई जाने वाली ट्रेन में बैठ जाता है !ऐसी स्थिति में टिकट चेक करने वाला कर्मचारी पेनल्टी के पश्चात उस व्यक्ति को सही ट्रेन में जाने की अनुमति दे देता है !ऐसे वैसे व्यक्ति सदैव ज्योतिष और इसके उपायों की तरफदारी करते नजर आते हैं !
3. अदृढ़ कर्म:-(नगण्य अपराध) ये वे कर्म होते हैं जो एक बुरे विचार के रूप में शुरू होते हैं और कार्य रूप में परिणत होने से पूर्व ही विचार के रूप में स्वतः खत्म हो जाते हैं ! जैसे एक लड़का आम के बाग को देखता है और उसका मन होता है ,कि बाग से आम तोड़कर ले आये लेकिन तभी उसकी नजर रखवाली कर रहे माली पर पड़ती है और वह चुपचाप आगे निकल जाता है !यहाँ बुरे विचारों का वैचारिक अंत हो जाता है अतः ये नगण्य अपराध की श्रेणी में आते हैं और थोड़े बहुत साधारण शांति – कर्मों के द्वारा इनकी शांति हो जाती है ! ऐसे व्यक्ति ज्योतिष के विरोध में तो नहीं दिखते लेकिन इसके ज्यादा पक्षधर भी नहीं होते ||
====आइये जाने किसी भी अपराध वाली कुंडली के मुख्य योग–
—-किसी भी जन्मकुंडली का छठा भाव मनुष्य के आन्तरिक पाप का है जो व्यक्ति के अंदर के ‘असामाजिक तत्त्व’ को पैदा करता है। 
—-अष्टम भाव उस अपराध के क्रियाकलाप से सम्बन्धित है और नवम भाव से उसका परिणाम प्रभावित होता है।
इन सब ज्योतिषीय कारकों के गहन विश्लेषण से ही निर्धारित किया जा सकता है की फलां व्यक्ति अपराध करेगा या नहीं ? करेगा तो कब करेगा ? किस तरह का अपराध करेगा ? आदि-आदि !
ज्योतिष के अनुसार इसके बहुत से योग होते है। यहाँ कुछ विशिष्ट योगों की जानकारी निम्नवत है—
—- लग्नेश व द्वादशेश अष्टमस्थ हो, षष्ठेश लग्नस्थ, अष्टमेश नवम में तथा राहु द्वादश भाव में हो तो जातक अपराध करता है। 
—- यदि कुंडली में  नेपच्यून वक्री हो, सप्तमेश चन्द्रमा दो अशुभ ग्रहो के साथ अशुभ भाव में हो तो जातक अपनी पत्नी का कत्ल कर देता है। 
— यदि कुंडली के लग्न में नेपच्यून हो, यूरेनस उससे समकोण पर हो, शुक्र और वक्री मंगल आमने-सामने हो, चन्द्र और शनि भी आमने-सामने हो, बृहस्पति सूर्य से समकोण पर हो और शनि लग्न से चतुर्थ स्थान पर हो तो व्यक्ति अपनी पत्नी या प्रेमिका की हत्या करता है।
—अष्टम भाव उस अपराध के क्रियाकलाप से सम्बन्धित है और नवम भाव से उसका परिणाम प्रभावित होता है। 
=== जब लग्नेश व द्वादशेश अष्टमस्थ हो, षष्ठेश लग्नस्थ, अष्टमेश नवम में तथा राहु द्वादश भाव में हो तो जातक अपराध करता है। 
=== जब कुंडली में  नेपच्यून वक्री हो, सप्तमेश चन्द्रमा दो अशुभ ग्रहो के साथ अशुभ भाव में हो तो जातक अपनी पत्नी का कत्ल कर देता है। अथवा लग्न में नेपच्यून हो, यूरेनस उससे समकोण पर हो, शुक्र और वक्री मंगल आमने-सामने हो, चन्द्र और शनि भी आमने-सामने हो, बृहस्पति सूर्य से समकोण पर हो और शनि लग्न से चतुर्थ स्थान पर हो।
—-आपराधिक प्रवृत्ति के लिए षष्ठेश व अष्टमेश के साथ दुष्ट ग्रहों की उपस्थिति नितान्त आवश्यक है। चन्द्रमा तथा वक्री बुध किसी भी व्यक्ति की आपराधिक प्रवृत्ति में वृद्धि करते हैं।
— आपराधिक प्रवृत्ति कार्यरूप में परिणित हो सकती है जब अरिष्टकारक ग्रहों की दशा भी हो।
— अपराध भावना के पूर्णरूपेण कार्यन्वयन के लिए यह आवश्यक है कि गोचर में अरिष्टकार ग्रहों पर शनि की दृष्टि-युति हो।
— कारावास के लिए कुछ विशेष प्रकार के योग अवश्य होने चाहिए। विशेषकर किसी व्यक्ति की लग्न कुण्डली और द्रेष्काण में अन्यथा अपराध करने पर भी कारावास नहीं हो सकता। इस बात को तृतीय और एकादश या चतुर्थ और दशम में बराबर ग्रह होने चाहिए। अर्था जितने ग्रह द्वितीय में हों, उतने ही द्वादश में हों। जितने ग्रह तृतीय में हों, उतने ही एकादश में भी हों अथवा जितने ग्रह चतुर्थ में हो, उतने ही दशम में भी हों। साथ ही सर्प या निगल द्रेष्काण होना चाहिए।
====ज्योतिष के अनुसार कुछ विशेष नक्षत्र बताए गए हैं, इस समय में चोरी या लूट होने पर व्यक्ति का धन वापस नहीं मिलता।ज्योतिष शास्त्र में 27 नक्षत्र बताए गए हैं, इनमें कुछ नक्षत्रों के समय विशेष सावधानी रखने की आवश्यकता होती है। इस संबंध में वेद-पुराण में एक श्लोक दिया गया है-
ऊ गुन पू गुन वि अज कृ म आ भ अ मू गुनु साथ।
हरो धरो गाड़ो दिया धन फिरि चढ़ई न हाथ।।
इसके श्लोक का अर्थ है ‘उ’ अक्षर से आरंभ होने वाले नक्षत्र (उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद), ‘पू’ अक्षर से आरंभ होने वाले नक्षत्र (पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपद), वि (विशाखा), अज (रोहिणी), कृ (कृतिका), म (मघा), आ (आद्र्रा), भ (भरणी), अ (अश्लेषा) और (मूल) भी इन्हीं नक्षत्रों के साथ शामिल है। इन चौदह नक्षत्रों में हरा हुआ धन, चोरी गया पैसा, लूटा गया पैसा और सोना, किसी के यहां अमानत के रूप में रखा पैसा, कहीं गाढ़ा हुआ पैसा या धन, किसी को उधार दिया गया धन वापस मिलने की संभावनाएं बहुत कम होती हैं। अत: इन विशेष नक्षत्रों के समय धन के संबंध में पूरी सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है।
—-यहाँ ध्यान देवें की बुध, बुद्धि के कारक हैं अत: अपराध का स्वरूप और हथियार इसी के अनुरूप हो जाते हैं। इंटरनेट के माध्यम से होने वाले अपराध, काग$जों में की जाने वाली हेरा-फेरी आदि प्रतिकूल बुध से ही होते हैं। 
—-यदि किसी जन्म कुंडली में उक्त स्थिति हो तो किसी योग्य और अनुभवी ज्योतिषी से सलाह कर ज्योतिषीय उपाय से अनुकूल या प्रतिकूल बनाया जाकर समाज और राष्ट्र उत्थान में योगदान दिया जा सकता है।
शुभम भवतु || कल्याण हो ||

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