महापुण्यकारी पर्व है गंगा दशहरा—-
इस वर्ष .9 जून ..1. को मनाया जायेगा …
ज्येष्ठ महीने में शुक्ल पक्ष की दशमी (इस वर्ष 19 जून 2013) के दिन गंगा का स्वर्ग से धरती पर अवतरण हुआ था। इस पवित्र तिथि पर गंगा दशहरा पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस बार यह पुण्य दिन 19 जून को आ रहा है।परोपकार का संदेश देता हें यह पर्व…
गंगा के पृथ्वी पर अवतरण दिवस यानि गंगा दशहरा इस बार दो दिन मनाया जाएगा। साथ ही दोनों दिन समान योग होने से स्नान दान आदि का पुण्य फल भी समान रूप से मिलेगा। इसके अलावा विशेष गोचर स्थिति से विभिन्न राशियों के जातकों के लिए पुण्य फल सामान्य और विशेष भी होंगे।
इस बार 18 जून मंगलवार को भी गंगा दशहरा का पर्व मनाया जाएगा। ज्योतिष गणना के अनुसार इस बार यह पुण्य फल समान रूप से दो दिनों तक यानि 18 व 19 जून को लिया जा सकता है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार दोनों दिन समान रूप से योग होंगे।
उन्होंने बताया कि शास्त्रों में वर्णित है कि यत्र बहूना योगा: सा ग्राहा।। अर्थात् जहां ज्यादा योग हों वहीं ग्रहण करें, लेकिन इन दोनों दिन ही पांच-पांच योग रहेंगे।
इसलिए दोनों दिन समान रूप से पुण्य लाभ कमाया जा सकता है। इसके अलावा इस दिन मिथुन और कन्या राशि के जातकों को अधिक पुण्य मिलेगा क्योंकि उस दिन चंद्रमा कन्या राशि व तुला पर विचरण करेंगे। साथ ही सूर्य बृहस्पति और मिथुन राशि पर। यह एक शुभ संयोग ही है कि दो दिन श्रद्धालु इस पुण्य का लाभ उठा पाएंगे।
गंगा को पापों का नाश करने वाली देवनदी माना जाता है। इसलिए धार्मिक मान्यता है कि इस दिन गंगा स्नान, व्रत, गंगा पूजा और उपासना से सभी दस पापों का नाश करने वाली होती है। इन पापों में तीन शरीर के, चार वाणी के और तीन मानसिक पाप होते हैं। इसलिए इसे दशहरा कहा जाता है। इस दिन शिव की उपासना भी विशेष फलदायी मानी गई है।
सबसे पवित्र नदी गंगा के पृथ्वी पर आने का पर्व है- गंगा दशहरा।
मनुष्यों को मुक्ति देने वाली गंगा नदी अतुलनीय हैं। संपूर्ण विश्व में इसे सबसे पवित्र नदी माना जाता है। राजा भगीरथ ने इसके लिए वर्षो तक तपस्या की थी। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन गंगा धरती पर आई। इससे न केवल सूखा और निर्जीव क्षेत्र उर्वर बन गया, बल्कि चारों ओर हरियाली भी छा गई थी। गंगा-दशहरा पर्व मनाने की परंपरा इसी समय से आरंभ हुई थी।
राजा भगीरथ की गंगा को पृथ्वी पर लाने की कोशिशों के कारण इस नदी का एक नाम भागीरथी भी है।ऐसा माना जाता है कि हस्त नक्षत्र में गंगा पृथ्वी पर आई।
स्कंदपुराण में दस योग होने पर यह तिथि बहुत शुभ मानी गई है। यह है – ज्येष्ठ माह, शुक्ल पक्ष, दशमी, बुध, हस्त नक्षत्र , व्यतीपात योग, गर, आनन्द, वृष राशि में रवि और कन्या राशि में चन्द्र की स्थिति।
गंगा स्नान की महत्त्वता—-
पुराण कथा अनुसार अपने पूर्वजों के मोक्ष और जगत कल्याण की इच्छा से महाराज भगीरथ ने स्वर्ग से गंगा को मृ़त्युलोक में लाने के लिए घोर तप किया। उनकी कठिन साधना से ही गंगा ने देवलोक से पृथ्वी पर आना स्वीकार किया। गंगा दशमी के दिन ही गंगा स्वर्ग से अपने प्रचण्ड वेग से भू-लोक में उतरी। यह वेग भगवान शिव की जटाओं में थमा। शिव की जटाओं से निकलकर गंगा महाराज भगीरथ के पीछे हिमालय के पवित्र तीर्थों से होती हुई ऋषि जाह्नु के आश्रम पहुंची। वहां से गंगा ने रसातल यानि पाताल लोक में प्रवेश कर भगीरथ के पूर्वज राजा सगर के ६० हजार पुत्रों का अपने पवित्र जल से मोक्ष किया़, जो कपिल मुनि के तेज से भस्म हुए थे।
भविष्य पुराण में लिखा हुआ है कि, जो मनुष्य इस दशहरा के दिन गंगा के पानी में खड़ा होकर दस बार इस स्तोत्र को पढ़ता है चाहे वो दरिद्र हो, चाहे असमर्थ हो वह भी प्रयत्नपूर्वक गंगा की पूजा कर उस फल को पाता है। यह दशहरा के दिन स्नान करने की विधि पूरी हुई।
स्कंद पुराण का कहा हुआ दशहरा नाम का गंगा स्तोत्र और उसके पढ़ने की विधि – सब अवयवों से सुंदर तीन नेत्रों वाली चतुर्भुजी जिसके कि, चारों भुज, रत्नकुंभ, श्वेतकमल, वरद और अभय से सुशोभित हैं, सफेद वस्त्र पहने हुई है।
मुक्ता मणियों से विभूषित है, सौम्य है, अयुत चंद्रमाओं की प्रभा के सम सुख वाली है जिस पर चामर डुलाए जा रहे हैं, वाल श्वेत छत्र से भलीभाँति शोभित है, अच्छी तरह प्रसन्न है, वर के देने वाली है, निरंतर करुणार्द्रचित्त है, भूपृष्ठ को अमृत से प्लावित कर रही है, दिव्य गंध लगाए हुए है, त्रिलोकी से पूजित है, सब देवों से अधिष्ठित है, दिव्य रत्नों से विभूषित है, दिव्य ही माल्य और अनुलेपन है, ऐसी गंगा के पानी में ध्यान करके भक्तिपूर्व मंत्र से अर्चना करें।
‘ॐ नमो भगवति हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे माँ पावय पावय स्वाहा’
यह गंगाजी का मंत्र है।
इसका अर्थ है कि, हे भगवति गंगे! मुझे बार-बार मिल, पवित्र कर, पवित्र कर, इससे गंगाजी के लिए पंचोपचार और पुष्पांजलि समर्पण करें।
इस प्रकार गंगा का ध्यान और पूजन करके गंगा के पानी में खड़े होकर ॐ अद्य इत्यादि से संकल्प करें कि, ऐसे-ऐसे समय ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से लेकर दशमी तक रोज-रोज एक बढ़ाते हुए सब पापों को नष्ट करने के लिए गंगा स्तोत्र का जप करूँगा। पीछे स्तोत्र पढ़ना चाहिए। ईश्वर बोले कि, आनंदरूपिणी आनंद के देने वाली गंगा के लिए बारंबार नमस्कार है।
इसी तरह मान्यता है कि गंगा ऐसी नदी है, जो तीनों लोकों देवलोक, मृत्युलोक और पाताल लोक को अपने पवित्र जल से तृप्त करती है। इसलिए इसे तृप्त गंगा भी कहते हैं। इसके साथ ही गंगा पाताल लोक में भोगवती और पितृलोक में वैतरणी के रुप में जानी जाती है।
नारद पुराण के अनुसार गंगा कृष्ण पक्ष के छठे दिन से लेकर अमावस्या तक पृथ्वी पर, शुक्ल पक्ष के पहले दिन से दसवें दिन तक पाताल लोक या रसातल में और शुक्ल पक्ष के ग्यारहवें दिन से लेकर पूर्णिमा और कृष्ण पक्ष के पांचवे दिन तक वह स्वर्ग में वास करती है।
श्री गंगा दशमी और उससे जुड़ी पौराणिक कथाओं को धर्म से परे जाकर व्यावहारिक और वैज्ञानिक नजरिए से विचार करें तो यही संदेश है कि हम अपने जीवन में जो भी कार्य करें, उसके लिए पूरी लगन, समर्पण, एकाग्रता और दृढ़ता के साथ प्रयास किया जाना चाहिए, महाराज भगीरथ की तरह। साथ ही उस कार्य या लक्ष्य प्राप्ति के लिए स्वार्थ की भावना न रखकर सभी के हित और परोपकार की सोच रखें। तभी आप गंगा के रुप में बेदाग सफलता पाएंगे और मान-सम्मान और प्रतिष्ठा के हकदार होंगे। जो अंतत: व्यक्तिगत, पारिवारिक और समाज के कल्याण की राह आसान बनाएगा।
दूसरी ओर गंगा और गंगा जल की बात करें तो वह यही संदेश देते है कि जीवन में हर तरह से पवित्र बनों, पूर्ण बनो, दक्ष बनो, गतिमान रहो, पाने से ज्यादा बांटने का भाव रखो तभी आप पूजित होगें। इसमें धर्म के रास्ते जल को सहेजने का भी एक संदेश है, जिसे व्यावहारिक रुप से अपनाने में ही इस पर्व की सार्थकता है।
संवत्सर का मुख—–
यह दिन संवत्सर का मुख माना गया है। इसलिए गंगा स्नान करके दूध, बताशा, जल, रोली, नारियल, धूप, दीप से पूजन करके दान देना चाहिए। इस दिन गंगा, शिव, ब्रह्मा, सूर्य देवता, भागीरथी तथा हिमालय की प्रतिमा बनाकर पूजन करने से विशेष फल प्राप्त होता है। इस दिन गंगा आदि का स्नान, अन्न-वस्त्रादि का दान, जप-तप, उपासना और उपवास किया जाता है। इससे दस प्रकार के पापों से छुटकारा मिलता है। इस दिन नीचे दिये गये दस योग हो तो यह अपूर्व योग है और महाफलदायक होता है। यदि ज्येष्ठा अधिकमास हो तो स्नान, दान, तप, व्रतादि मलमास में करने से ही अधिक फल प्राप्त होता है। इन दस योगों में मनुष्य स्नान करके सब पापों से छूट जाता है।
क्यों और कैसे करें गंगा दशहरा व्रत..???
—-गंगा दशहरा का व्रत भगवान विष्णु को खुश करने के लिए किया जाता है।
—-इस दिन भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की जाती है।
—-इस दिन लोग व्रत करके पानी भी (जल का त्याग करके) छोड़कर इस व्रत को करते हैं।
—-ग्यारस (एकादशी) की कथा सुनते हैं और अगले दिन लोग दान-पुण्य करते हैं।
—-इस दिन जल का घट दान करके फिर जल पीकर अपना व्रत पूर्ण करते हैं।
—-इस दिन दान में केला, नारियल, अनार, सुपारी, खरबूजा, आम, जल भरी सुराई, हाथ का पंखा आदि चीजें भक्त दान करते हैं।
क्या हैं दान-पुण्य का महत्व..???
गंगा दशहरा के दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व है। इस दिन लोग पूजा-अर्चना करने के साथ ही दान-पुण्य करते हैं। कई लोग तो स्नान करने के लिए हरिद्वार जैसे पवित्र नदी में स्नान करने जाते हैं। इस दिन दान में सत्तू, मटका और हाथ का पंखा दान करने से दुगुना फल प्राप्त होता है।
गंगा दशहरा के दिन किसी भी नदी में स्नान करके दान और तर्पण करने से मनुष्य जाने-अनजाने में किए गए कम से कम दस पापों से मुक्त होता है। इन दस पापों के हरण होने से ही इस तिथि का नाम गंगा दशहरा पड़ा है।
इस प्रकार करें गंगा दशमी पूजन—-
ऋष्यशृंग के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर प्रात: कालीन कार्यों से निवृत्त होकर गंगा जल से स्नान कर सर्वप्रथम इस दिन अपने घर में ताम्र पत्र में जल भर कर दूब से जल छिड़कें और अपने मंदिर या देवालय में बैठ कर षोडशोपचार से गंगा जी का पूजन करें, गंगाष्टक व गंगास्तोत्र का पाठ करें तथा आरती सहित प्रसाद वितरण करें।ऋष्यशृंग के अनुसार इस दिन शिवलिंग के दर्शन तथा दस अश्वमेध घाट या गंगादर्शन व गंगास्नान धन-धान्य की बढ़ोतरी व गृह शांति के लिए लाभकारी माना गया है। इस दिन दान व्रत व स्नान से दस जन्मों में अर्जित हुए पापों से भी मुक्ति की बात कही गई है।
करें कुमारी पूजन—-
इस दिन दशहरा स्तोत्र और कुमारी पूजन का भी विधान है। इस दिन 5 से 11 वर्ष तक की स्वस्थ कन्याओं को, गंगा स्नान करवा कर लाल व पीले फूलों से उनके पैरों की पूजा करें और भोजन करा कर यथा शक्ति दक्षिणा प्रदान करें। क्योंकि कुमारियों को गंगा का प्रतीक माना गया है
गंगा स्नान के हैं विशेष मंत्र—-
गंगा स्नान में विशेष मंत्रों का ध्यान रखा जाता है। इसलिए विभिन्न पर्वो के लिए विशेष मंत्रों का भी प्रावधान है। गंगा दशहरा के लिए भी शास्त्र में कुछ विशेष मंत्र वर्णित हैं जिन्हें पढ़कर गंगा स्नान करने से निश्चित रूप से पुण्य फल मिलता है। जो कि इस प्रकार है:- ओइम् नम: शिवायै नाराण्यै दशहरायै गंगायै नम:।।
इस गंगा दशमी/दशहरे पर अपनी राशी अनुसार यह करें दान-पुन्य—–
मेष राशि—
इस राशि के जातकों के लिए ज्योतिषीय दृष्टि से धन, भोजन व वाहन उत्तम हैं। अत: दशहरे के दिन बुद्धि व वाणि की प्रप्ति तथा उक्त लाभ को प्रगाढ़ करने के लिए गेहूं, मसूर, लाल वस्त्र, लाल रंग की साड़ी, पीले रंग के आभूषण, सोना, ताम्बा, कनेर के फूल आदि कन्याओं को भोजन करा कर दान देना चाहिए।
वृष राशि—
इस राशि वालों के लिए पारिवारिक संकट, पुत्र प्राप्ति और मानसिक अशांति के निराकरण के लिए गंगा दशमी के दिन कुमारियों को सफेद वस्त्र तथा चांदी के आभूषण देने चाहिएं। किसी योग्य ब्राह्मण को सफेद वस्त्र व गोदान किया जा सकता है।
मिथुन राशि—
परिवार, मित्र वर्ग व वाहन सहित धन-धान्यादि विविध प्रकार की सुविधा में विशेष योग बढ़ाने के लिए दशहरे के दिन कन्याओं को हरे रंग के वस्त्र, आभूषण व पंडितों को पन्ना, ताम्बे के बर्तन दान करें। डाकोत को मूंग व हरे वस्त्रों का दान करें। इस राशि वाले जातकों को इस दिन हरी सब्जी का ज्यादा उपयोग करना चाहिए।
कर्क राशि—
विविध बाधाओं के निवारण, पारिवारिक कलह, घर में अशांति के योगों के निराकरण एवं सुख शांति तथा भवन निर्माण आदि के लिए इस दिन, योग्य पंडित या कन्या को सफेद वस्त्र, मोती, गोबछिया व चांदी का दान देना चाहिए।
सिंह राशि—
इस राशि के जातक स्वजनों से पीड़ा, बार-बार स्थान परिवर्तन, स्थानांतरण आदि के योग के बचाव के लिए गंगा दशमी के दिन गंगा जी को कमल के फूल चढ़ाएं या गंगा में प्रवाहित करें। इस दिन गुड़, सोने, ताम्बे का दान उत्तम है।
कन्या राशि—-
इस राशि के जातकों के लिए धन लाभ, शत्रु पराजय व सर्वशांति के लिए 9 से 11 वर्ष तक की कन्या को हरे रंग के सुनहरे वस्त्र भेंट करने चाहिएं और उन्हें भोजन करवाना चाहिए।
तुला राशि—-
इस राशि के जातकों के लिए अनिष्टकाल, धन की हानि, बुद्धि क्षय, नौकरी से हटाया जाना, या नौकरी को लेकर तनाव आदि के निवारण के लिए इस दिन गंगा माता की षोडशोपचार के साथ पूजा अर्चना करें। गंगा स्नान करें तथा गंगा में या किसी देवालय में घी के 11 दीपक जलाएं।
वृश्चिक राशि—-
सात से आठ वर्ष की स्वस्थ कन्या को लाल वस्त्रों या आभूषणों का भोजन कराकर दान दे अथवा किसी जरूरत मंद निर्धन विप्र को लाल वस्त्र व लाल रंग का कम्बल दान देना चाहिए।
धनु राशि—-
इस राशि के जातकों के लिए स्थान सम्बन्धी बाधा, शारीरिक या मानसिक पीड़ा और धन प्राप्ति के लिए इस दिन किसी कन्या या जरूरत मन्द सुहागिन महिला को हल्दी की पांच गांठें,मिश्री, पीले वस्त्रों या पीले आभूषणों का दान करना चाहिए।
मकर राशि—-
इस राशि के जातकों के लिए आरोग्य व धन क्षय से बचाव के लिए गंगादशमी को डाकोत को तिल, उड़द, काली गाय, भैंस व काले वस्त्रों का दान करना चाहिए। घर में गुलाबी व काले रंग के कपड़े पहनने चाहिएं।
कुम्भ राशि—-
इस राशि के जातकों के लिए सर्वकार्य सिद्धि, पराक्रम में वृद्धि, पुत्र व संतान सुख की प्राप्ति के साथ ही धन-धान्य में अभिवृद्धि के लिए इस दिन नीलम, काली गाय का दान किसी डाकोत को करें तथा इस दिन तिल व उड़द का घर में सूक्ष्म उपयोग करें।
मीन राशि—-
इस राशि के जातकों के लिए विविध पीड़ाओं के निदान, शोक, संकट भयंकर बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों के लिए एवं सर्व शांति के लिए हल्दी से स्वयं मस्तक पर थोड़े समय के लिए लेपन करें व पीले वस्त्र धारण करने चाहिएं। इस दिन पुखराज सोने के आभूषण या हल्दी की 11 गांठें किसी योग्य पुरोहित को दान करें।

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