दरिद्रता दूर करता हें..दक्षिणावर्ती शंख…
पौराणिक प्रसंगों के अनुसार एक बार भगवान् विष्णु ने लक्ष्मीजी
से यह पूछा कि आपका निवास कहाँ-कहाँ होता है? उत्तर में
लक्ष्मीजी ने कहा …
अर्थात् मैं लाल कमल, नील कमल, शंख, चन्द्रमा, और
शिवजी में निवास करती हूँ। इसलिए शंख को लक्ष्मीप्रिया, लक्ष्मी
भ्राता, लक्ष्मी सहोदर आदि नामों से जाना जाता है। पौराणिक
कथानकों के अनुसार समुद्र मंथन के समय चैदह प्रकार के रत्नों की
उत्पत्ति हुई थी, उनमें से एक रत्न शंख भी था। चूँकि लक्ष्मी भी समुद्र
मंथन से उत्पन्न हुई थी, अतः समुद्र से उत्पन्न होने के कारण ये दोनों
भाई-बहिन हैं। पौराणिक उल्लेखों में शंख को देवता का दर्जा दिया
गया है। अर्थवेद में इसे शत्रुओं को परास्त करने वाला, पापों से रक्षा
करने वाला, राक्षसों और पिशाचों को वशीभूत करने वाला, रोग और
दरिद्रता को दूर करने वाला, दीर्घायु प्रदान करने वाला तथा आध्
िाव्याधि से रक्षा करने वाला वताया गया है। शंख के इस महत्व तथा
लक्ष्मी का निवास स्थल होने के कारण जिस घर में शंख स्थित होता
है, वहाँ लक्ष्मी जी का निवास अवश्य होता है।
दायीं ओर की भँवर वाला शंख दक्षिणावर्ती कहलाता है। दक्षिणावर्ती
शंख का आध्यात्मिक महत्व होने के कारण वह बहुत ही शुभ, श्री एंव
समृद्धिदायक और वैभवकारी होता है। यह श्ंाख गेहूँ के दाने से लेकर
एक जटा युक्त नारियल के आकार तक हो सकता है, दुर्लभ होने के
कारण यह वामावर्ती शंख से महँगा होता है।
प्रायः सभी दक्षिणावर्ती शंख मुख बन्द किए होते है। यह शंख
बजाए नहीं जातेे हैं, केवल पूजा रूप में ही काम में लिए जाते है।
शास्त्रो में दक्षिणावर्ती शंख के कई लाभ बताए गए हैं। जिनमें से
मुख्यरूप से निम्नलिखित लाभ है।
राज सम्मान की प्राप्ति, लक्ष्मी वृद्धि, यश और कीर्ति वृद्धि, संतान
वृद्धि, बाँझपन से मुक्ति, आयु की वृद्धि, राज्य से लाभ, शाकिनी, भूत,
बेताल, पिशाच, ब्रहाराक्षस आदि से मुक्ति, आकस्मिक मृत्यु के भय
से मुक्ति, शत्रु भय से मुक्ति, अग्रि भय से मुक्ति, चोर भय से मुक्ति,
सर्प भय से मुक्ति, दरिद्रता से मुक्ति….
दक्षिणावर्ती शंख में जल भरकर उसे जिसके ऊपर छिड़क दिया
जाए, वह व्यक्ति तथा वस्तु पवित्र हो जाती है।
ऐसे व्यक्ति के दुर्भाग्य, अभिचार, अभिशाप और दुग्र्रह के प्रभाव
समाप्त हो जाते है। साथ ही जादू-टोना, रोग, नजर जैसे अभिचार
कृत्य भी इस जल के स्पर्श से शान्त हो जाते है। दक्षिणावर्ती शंख
जहाँ भी रहता है, दरिद्रता वहाँ से पलायन कर जाती है। इस प्रकार
निर्धनता निवारण के लिए यह सर्वश्रेष्ठ तंत्रोक्त वस्तु है।
चूँकि लक्ष्मी साधना का सर्वोत्कृष्ट दिन दीपावली नजदीक ही है,
अतः इस दिन दक्षिणावर्ती शंख को अपने घर में स्थापित कर पूजार्चन
करके उपयुक्त सभी लाभों को प्राप्त किया जा सकता है।
शास्त्रों में कहा गया है कि दक्षिणावर्ती शंख से उपयुक्त फलों
के साथ साथ सभी प्रकार की मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। उक्त फलों
की प्राप्ति एंव मनोकामना की पूर्ति के लिए दीपावली पर दक्षिणावर्ती
शंख का पूजन विधि संक्षेप में निम्नलिखित हैः
घर के एकांत कक्ष में पश्चिम दिशा में दीवार
के सहारे एक चैकी बिछाएँ और उस पर लाल वस्त्र बिछाएँ। अब
उस लाल वस्त्र पर रोली और हल्दी से रंगे हुए चावलों से आसन
(संभव हो, तो अष्टदल, नहीं तो सामान्य वर्गाकार या वृताकार बना
लें।
अब दक्षिणावर्ती शंख को पंचामृत एंव गंगाजल से
स्नान कराएँ। इसके उपरान्त लाल चन्दन से दक्षिणावर्ती शंख पर
श्री अंकित करें। तदुपरान्त शंख को चैकी पर बनाए गए आसन पर
स्थापित कर दें।
अब निम्न प्रकार से दक्षिणावर्ती शंख का ध्यान करें।
सर्वविध आभरणों से भूषित, उत्तमोत्तम अंग और उपांगों से युक्त,
कल्पवृक्ष के नीचे स्थित कामधेनु, चिंतामणि और नवनिधि स्वरूप,
चैदह रत्नों से परिवृत्त, आठ महासिद्धियों से संयुक्त, माता लक्ष्मी क
साथ कृष्ण भगवान् के हाथ में शोभायमान श्री शंख महानिधि को मैं
प्रणाम करता हूँ।
अब दक्षिणावर्ती शंख का लाल चन्दन, अक्षत, पुष्प, ध्
ाुप-दीप एवं कपूर से पूजन करें। तदुपरान्त शंख में गाय का कच्चा
दूध भरें और अंत में नैवेध चढ़ाएँ।
अब निम्नलिखित प्रकार से दक्षिणावर्ती शंख का ध्यान
करें। उत्तम वर्ण के श्वेत आभा से युक्त लक्ष्मी के सहोदर तथा समस्त
इच्छित वस्तु को देने वाले देवस्वरूप दक्षिणावर्ती शंख को में प्रणाम
करता हूँ। समुद्र के पुत्र, मन की इच्छाओं का पूर्ण करने वाले तथा
राज्य, धन, संतान आदि के फल को देने वाले शंख को में प्रणाम करता
हूँ। हे दक्षिणावर्ती शंख आप कल्याणकर्ता, पापहारी, इच्छित दाता तथा
विघ्नों से बचाने वाले है, अतः हे देव मेरे सभी मनोरथों को पूर्ण करो।
दक्षिणावर्ती शंख बहुत भाग्यशाली होता
है। कंुकुम से शंख पर स्वास्तिक का चिहृ अंकित कर दें। फिर बायें
हाथ से अक्षत का एक-एक दाना शंख में अर्पित करते हुए जपें।
अगले दिन भी इसी मंत्र का जप करें। अक्षत अर्पित करते रहें। जिस
दिन शंख पूरा भर जाय। तब तंत्र प्रयोग बंद कर दें तथा चावल के
दानों के साथ शंख को उसी रेशमी लाल वस्त्रों में बांधकर पूजा के
स्थान के स्थान पर अपने घर, फैक्ट्री या कंपनी के आफिस में स्थापित
कर दें।

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