ये ज्योतिष शास्त्र है या संभावनाओं का विज्ञान……by पं.डी.के.शर्मा”वत्स”—
यह बात मैं समय समय पर पूर्व के अपने कईं लेखों में कह चुका हूँ कि ज्योतिष पूरी तरह से कर्म आधारित शास्त्र है, हालाँकि ऎसे लोगों की कोई कमी नहीं, जो इस विधा को विज्ञान सिद्ध करने के बेफालतू के प्रयास में जुटे रहते हैं, उन लोगों से मेरा यही कहना रहता है कि क्या विज्ञान में कोई ऎसा सिद्धांत,कोई ऎसी पद्धत्ति है–जिसके जरिए कर्मों को मापा जा सके, मानव के भाग्य, दुर्भाग्य या पुरूषार्थ को किसी कसौटी पर परखा जा सके ?.
दरअसल आज ज्योतिष जैसी इस दैवीय विधा का सबसे अधिक बंटाधार किया है तो सिर्फ इसे विज्ञान साबित करने वाले लोगों ने. ये वो लोग हैं, जो नए नए कपोल कल्पित सिद्धांतों का निर्माण करके कोई काली किताब लिख रहा है,कोई नीली किताब लिख रहा है, कोई कहता है कि फलाना ज्योतिष तो कोई ढिमकाणा ज्योतिष. इस विद्या के वास्तविक सत्य को ये लोग अपने कल्पित सिद्धान्तों के कचरे के ढेर के नीचे कहीं गहरे दबाते चले जा रहे है. कभी इस धरती पर इस विधा के ऎसे ज्ञाता भी हुए हैं, जो कि जन्मपत्रिका देखकर इन्सान के पूर्व तथा आगामी जन्मों का हाल तक बता दिया करते थे,लेकिन आज इस प्रकार की स्थिति हो चुकी है जिसे देख-सुन कर कभी कभी तो हँसी भी आती है ओर रोना भी।
अभी कल एक चैनल पर देखा कि एक ज्योतिषी महाराज गले में ढेरों मालाएं,लाकेट और दोनों हाथों की दसों उंगलियों में रत्नों की अंगूठियाँ धारण किए हुए विराजमान थे, जिन्हे कि सामने बैठा व्यक्ति आचार्य जी के नाम से संबोधित कर रहा था. वो व्यक्ति पत्रों के ढेर में से कोई एक पत्र निकालता ओर भेजने वाले के नाम के साथ उसमे पूछे गए सवाल के बारे में आचार्य जी को बताता. आचार्य जी अपने लैपटाप पर कुछ क्षण( बामुश्किल . मिन्ट) ग्रह गणना करते और जिज्ञासु के प्रश्न का उत्तर देने लगते. पत्रों के ढेर में से उन्होने एक पत्र उठाया, जिसमें किसी अविवाहित लडकी नें उनसे सवाल पूछा था कि “पंडित जी,मेरी आयु .6 वर्ष है और माता-पिता मेरी शादी के लिए बहुत चिन्तित है, बहुत से लडके देखे लेकिन कहीं बात नहीं बन रही. कृ्पा करके आप बताइये कि मेरी शादी कब तक हो पाएगी ”
अब जरा आचार्य जी का उत्तर सुन लीजिए कि उन्होने क्या जवाब दिया—“आपकी शादी .2 वर्ष की आयु पश्चात होने की संभावना है,किन्तु आपका वैवाहिक जीवन बहुत ही कष्टकारी रहेगा क्यों कि आपकी जन्मकुंडली बता रही है कि आपको जीवनसाथी क्रोधी स्वभाव एवं बुरे कर्म करने वाला मिलेगा. लेकिन आप एक काम कीजिए—शुक्रवार के दिन आप एक लाल रंग का सेब जमीन में दबाएं और प्राणप्रतिष्ठित किया गया नवग्रह लाकेट(न्यौछावर मात्र 51.0 रूपये) गले में धारण कर लें तो शीघ्र ही आपका विवाह एक अच्छे कुल में हो जाएगा और आगामी जीवन भी सुखमय व्यतीत होगा.
अब भला कोई इन आचार्य जी से पूछे कि एक ओर तो आप कह रहे हैं कि विवाह 32 वर्ष की आयु पश्चात होने की संभावना है ओर आपका वैवाहिक जीवन कष्टपूर्ण रहेगा वहीं दूसरी ओर आप कह रहे हैं कि ये उपाय कर लें तो विवाह जल्दी हो जाएगा ओर गृ्हस्थ जीवन भी सुखमय व्यतीत होगा. वो भी सिर्फ एक सेब भूमी में दबा देने और लाकेट पहन लेने से. धन्य हो महाराज! भला बताईये कि सेब नहीं हुआ, जादुई चिराग हो गया, जिसे रगडा ओर बस इच्छापूर्ती हो गई. ओर देखिए, सेब और उस लाकेट में इतनी जादुई शक्ति छिपी है कि जो कार्य अब से छ: वर्ष बाद होना था,वो अभी के अभी हो जाएगा. धन्य हो प्रभु!!!!! मैं तो ये नहीं समझ पा रहा हूं कि ये आचार्य किस चीज के हैं! जरूर या तो इन्होने ये आचार्य की पदवी चने देकर हासिल की है या फिर अपनी जिन्दगी में इन्होने सिर्फ गधे हाँके हैं. ज्योतिष से तो इन लोगों का कहीं दूर दूर तक भी वास्ता नहीं. इस दैवीय विधा का पूरी तरह से बेडा गर्क करके रख दिया इन लोगों नें. ज्योतिष शास्त्र को “सम्भावना-शास्त्र” में बदल डाला है.
इनके जैसे पाखंडियों के कारण ही आज हर कोई ऎरा-गेरा जिसे कि ज्योतिष की एक धेले की भी समझ नहीं हैं,इस विधा के औचित्य पर उंगली उठाने लगता है.
मेरी नजर में एक सही ज्योतिषी की यही पहचान है कि ऎसा व्यक्ति कभी भी संभावना जैसे शब्दों का आश्रय नहीं लेगा. अगर जातक के भाग्य में ये होना लिखा है तो पक्का लिखा है. उसे कोई भी दुनिया की ताकत नहीं मिटा सकती. हाँ उपाय का अर्थ सिर्फ इतना है कि यदि भाग्य में किसी अहितकारी घटना का होना लिखा है तो उपाय से हम लोग उसकी तीव्रता को तो अवश्य कम कर सकते हैं किन्तु उसे टाल नहीं सकते. यदि कोई घटना किसी अमुक वर्ष में होनी निश्चित है तो वो उसी समयान्तराल में ही घटित होगी, ये नहीं कि किसी उपाय द्वारा आप उसके समय में किसी भी प्रकार का परिवर्तन कर सकें. ईश्वर द्वारा ये विधा मनुष्य को सिर्फ भविष्य दर्शन हेतु प्रदान की गई है ये नहीं कि इसके माध्यम से आप ईश्वर को ही चुनौती देने लगें.
###भारतीय वैदिक ज्योतिष का एकमात्र रहस्य यह है कि यह शास्त्र चिरन्तन और जीवन से सम्बद्ध सत्य का विश्लेषण करता है. संसार के समस्त शास्त्र जहाँ जगत के किसी एक अंश का निरूपण करते हैं,वहीं वैदिक ज्योतिष शास्त्र आन्तरिक एवं बाह्य दोनों जगतों से सम्बंधित समस्त ज्ञेयों का प्रतिपादन करता है. इसका सत्य दर्शन के समान जीव और ईश्वर से या विज्ञान के समान पदार्थ के घनत्व-तापमान आदि से ही सम्बंद्ध नहीं है,अपितु यह उससे कहीं आगे का भाग है. मानव के समक्ष जहाँ दर्शन एवं भौतिक विज्ञान नैराश्यवाद,वैराग्य अथवा भयोत्पादन की धूमिल रेखा अंकित करता है,वहाँ ज्योतिष उसे कर्तव्य क्षेत्र में ला उपस्थित करता है. साथ ही भविष्य को अवगत करा कर अपने कर्तव्यों द्वारा उसे अनुकूल बनाने के लिए ज्योतिष ही प्रेरणा देता है. यही प्रेरणा प्राणियों के लिए दु:ख-विघातक और पुरूषार्थ साधक होती है.
वैदिक ज्योतिष और कर्म सिद्धान्त के आपसी गहन सम्बन्ध की बात की जाए तो,उसके लिए सबसे पहले तो बताना चाहूँगा कि सम्पूर्ण ज्योतिष शास्त्र सिर्फ इसी कर्म-सिद्धान्त की भित्ति पर खडा है.बल्कि यूँ कहें कि कर्म चक्र का ये सिद्धान्त ही तो इस शास्त्र की आत्मा है.यदि इस आत्मा को इससे विलग कर दिया जाए तो फिर शेष रह जाता है——लाल किताब,काली किताब,सुनहरी किताब और अलाणा ज्योतिष-ढिमकाणा ज्योतिष के रूप में इसका निर्जीव शरीर.और एक मृ्त शरीर सिवाय उस पर पलने वाले जीवों के उदर भरण के, किसी का भला क्या हित साध सकता है.
जो विद्वान इस विद्या के मर्म को जानते है, इसके गहन तत्वों को आत्मसात कर चुके है, वो भलीभान्ती जानते है कि इस आदिकालीन शास्त्र के प्रवर्तक ऋषियों-मुनियों,महर्षियों नें कहीं भी किसी ऎसे निर्दयी विधाता की सत्ता की कल्पना नहीं की,जो जैसे चाहे,जब चाहे,मनुष्य के साथ खेल खेलता रहे. इसके विपरीत यहाँ तो स्पष्ट शब्दों में घोषणा की गई है,कि इस ब्राह्मंड में घटने वाली प्रत्येक घटना एक सुनियोजित,सुनिश्चित नियम द्वारा बँधी है और वो नियम है—कर्म सिद्धान्त. इन्सान को उसके वर्तमान जीवन में जो कुछ भी मिल रहा है,कर्म के नियमों द्वारा सुनिश्चित व सुनियोजित है.एक बार कर्म करके उसका फल तो आपको मिलेगा ही. यद्यपि इन्सान कर्म करने या न करने में अपनी स्वतन्त्र इच्छा-शक्ति का प्रयोग कर सकता है. किन्तु जब एक बार कर्म कर दिया गया,तो फिर उसका फल मिलने से आपको इस सृ्ष्टि की कोई ताकत नहीं रोक सकती—-स्वयं विधाता भी नहीं. उसके बाद कर्म के अनिवार्य फल से बच निकलने का कोई मार्ग नहीं है. हाँ, इन्सान अपनी स्वतन्त्रबुद्धि द्वारा फल की अनुभूति में बहुत कुछ अँशों तक तारतम्य उत्पन कर सकता है,और सतत अभ्यास एवं प्रयास द्वारा अपना भविष्य बना सकता है. एक प्रकार से कहें तो वो अपने भाग्य का सृ्जन कर सकता है……..

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